प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इजरायल दौरे और नेसेट (इजराइली संसद) में दिए गए ऐतिहासिक भाषण ने वैश्विक राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। जबकि इजरायली मीडिया ने इसे मजबूत रणनीतिक साझेदारी का संकेत बताया, वहीं कई मुस्लिम देशों की मीडिया ने इसे फिलिस्तीन मुद्दे से दूरी के रूप में देखा। पीएम मोदी के दौरे पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं साफ तौर पर बंटी हुईं।
पीएम मोदी ने नेसेट में क्या कहा
प्रधानमंत्री मोदी ने नेसेट में संबोधन के दौरान भारत-इजरायल संबंधों को नई दिशा देने पर जोर दिया। यह पहला मौका था जब किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने इजरायली संसद में भाषण दिया और उन्हें ‘मेडल ऑफ द नेसेट’ से सम्मानित किया गया। अपने भाषण में उन्होंने तीन मुख्य बिंदुओं पर जोर दिया:
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आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख: 7 अक्टूबर 2023 को हुए हमास हमलों को ‘बर्बर’ बताते हुए मोदी ने कहा कि भारत इजरायल के दुख में खड़ा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी कारण नागरिकों की हत्या को सही नहीं ठहरा सकता।
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पुराने सांस्कृतिक रिश्ते: मोदी ने यहूदी और हिंदू समुदायों के साझा इतिहास और परंपराओं का उल्लेख करते हुए संवेदनशील क्षेत्रों में सहयोग की वैधता बढ़ाने की कोशिश की।
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भविष्य में तकनीक और अर्थव्यवस्था में साझेदारी: उन्होंने I2U2 और IMEC जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों के जरिए सहयोग बढ़ाने की अपील की।
पीएम मोदी ने अब्राहम एकॉर्ड्स की सराहना की और कहा कि क्षेत्र में शांति की राह पहले से ज्यादा कठिन हो गई है, लेकिन न्यायपूर्ण और स्थायी शांति की दिशा में प्रयास जारी रहना चाहिए।
इजरायल मीडिया की प्रतिक्रिया
इजरायल की विदेश मामलों की विशेषज्ञ लॉरेन डैगन अमोस के मुताबिक, पीएम मोदी का भाषण सिर्फ औपचारिक नहीं था। उन्होंने अंग्रेजी में भाषण देकर इसे वैश्विक स्तर तक पहुंचाया। डैगन के अनुसार, भाषण अमेरिका, खाड़ी देशों और वैश्विक आर्थिक जगत को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था।
पीएम मोदी ने भाषण में सुरक्षा, रणनीति और तकनीक के जरिए भारत-इजरायल साझेदारी को बड़े क्षेत्रीय और वैश्विक ढांचे का हिस्सा बनाने की कोशिश की। उन्होंने योग, संस्कृति और सॉफ्ट पावर के प्रतीकों का इस्तेमाल कर जनता का समर्थन हासिल किया।
मुस्लिम देशों की मीडिया की नाराज़गी
कुछ मुस्लिम देशों की मीडिया ने पीएम मोदी के भाषण को फिलिस्तीन मुद्दे से दूरी और इजरायल के प्रति भारत की बढ़ती नज़दीकी के रूप में देखा। उनका मानना है कि मोदी ने इजरायल के साथ सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी को प्रमुखता दी और फिलिस्तीन के प्रति पारंपरिक समर्थन की अपेक्षा को कमतर रखा।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत अब इजरायल के साथ द्विपक्षीय रिश्तों से आगे बढ़कर क्षेत्रीय और वैश्विक रणनीतिक साझेदारी पर जोर दे रहा है। सुरक्षा मामलों, निवेश, और इन्फ्रास्ट्रक्चर में सहयोग को बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय मंचों को अपनाया।
रणनीतिक संदेश और वैश्विक असर
पीएम मोदी ने भाषण में यह संदेश दिया कि भारत अब इतना प्रभावशाली है कि वह अपने दोस्तों और साझेदारों के चुनावों पर वैश्विक प्रतिक्रिया की चिंता किए बिना रणनीतिक फैसले ले सकता है। भाषण का मुख्य उद्देश्य इजरायल के साथ साझेदारी को संवेदनशील और स्थायी ढांचे में डालना था।
मोदी ने यह भी दिखाया कि भारत-इजरायल रक्षा सहयोग केवल वर्तमान हितों पर आधारित नहीं है, बल्कि दोनों देशों के लोगों, संस्थाओं और साझा अतीत से गहराई से जुड़ा है।
निष्कर्ष:
प्रधानमंत्री मोदी का इजरायल भाषण न केवल ऐतिहासिक था, बल्कि भारत-इजरायल संबंधों में नई रणनीतिक दिशा भी पेश करता है। इजरायल में इसे सकारात्मक दृष्टि से देखा गया, जबकि मुस्लिम देशों की मीडिया ने इसे फिलिस्तीन से दूरी और नई वैश्विक नीति के रूप में प्रस्तुत किया।