बीजेपी ने चलाया बड़ा दांव
उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपने उम्मीदवार के नाम का ऐलान कर दिया है। एनडीए की ओर से तमिलनाडु के वरिष्ठ नेता और वर्तमान में महाराष्ट्र के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाया गया है। इस कदम को बीजेपी का मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। पार्टी का यह फैसला न केवल एनडीए को एकजुट रखने की कोशिश है, बल्कि विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक में सेंध लगाने की रणनीति भी मानी जा रही है।
बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने उम्मीदवार की घोषणा करते हुए कहा कि विपक्ष से भी बातचीत की जाएगी और सर्वसम्मति बनाने की कोशिश होगी।
दक्षिण भारत से उम्मीदवार उतारने की रणनीति
सीपी राधाकृष्णन का नाम आगे बढ़ाकर बीजेपी ने एक साथ कई समीकरण साधने की कोशिश की है। वह तमिलनाडु से आते हैं और लंबे समय से दक्षिण भारत की राजनीति में सक्रिय रहे हैं। फिलहाल वे महाराष्ट्र के राज्यपाल हैं। इस वजह से बीजेपी का यह कदम महाराष्ट्र और तमिलनाडु—दोनों ही राज्यों की सियासत को प्रभावित कर सकता है।
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महाराष्ट्र में असर: उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) के सामने यह चुनौती है कि वे अपने ही राज्यपाल के खिलाफ मतदान कैसे करें।
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तमिलनाडु में असर: डीएमके और एआईएडीएमके दोनों ही क्षेत्रीय अस्मिता को लेकर संवेदनशील हैं। ऐसे में किसी भी दल के लिए राधाकृष्णन का विरोध करना आसान नहीं होगा।
पहले भी हुई है सेंधमारी
भारतीय राजनीति में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव अक्सर विपक्षी खेमे में सेंधमारी का कारण बनते रहे हैं।
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2007: यूपीए ने प्रतिभा पाटिल को उम्मीदवार बनाया था। शिवसेना, एनडीए का हिस्सा होते हुए भी यूपीए के पक्ष में वोट कर गई।
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2012: प्रणब मुखर्जी के समर्थन में जेडीयू और शिवसेना खड़ी हो गईं, जबकि वे विपक्ष का हिस्सा थीं।
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2017: एनडीए ने रामनाथ कोविंद को उम्मीदवार बनाया, तब बिहार के राज्यपाल होने के कारण जेडीयू ने विपक्ष में रहते हुए भी समर्थन दिया।
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2022: उपराष्ट्रपति चुनाव में एनडीए उम्मीदवार जगदीप धनखड़ के मुकाबले विपक्षी उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा थीं। तब भी टीएमसी ने मतदान से दूरी बनाकर विपक्ष को झटका दिया।
इन घटनाओं से साफ है कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनावों में पार्टियां अक्सर गठबंधन की सीमाओं से बाहर जाकर फैसला लेती रही हैं।
उद्धव और स्टालिन की कशमकश
सीपी राधाकृष्णन की उम्मीदवारी ने सीधे-सीधे उद्धव ठाकरे और एमके स्टालिन को असमंजस में डाल दिया है।
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उद्धव ठाकरे अगर राधाकृष्णन का विरोध करते हैं, तो संदेश जाएगा कि उन्होंने अपने ही राज्यपाल को नकार दिया। शिवसेना (यूबीटी) के नेता संजय राउत ने बयान दिया है कि “राधाकृष्णन बहुत अच्छे इंसान हैं और विवादों से दूर रहे हैं।” इस बयान से अंदाजा लगाया जा सकता है कि शिवसेना खुलकर विरोध करने से बच सकती है।
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एमके स्टालिन और डीएमके के सामने भी मुश्किल है। तमिलनाडु की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते राज्य के उम्मीदवार का विरोध करना उनके लिए आसान नहीं होगा। वहीं, अगले साल तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव भी हैं, जहां बीजेपी और एआईएडीएमके इसे बड़ा मुद्दा बना सकते हैं।
विपक्षी एकता पर सवाल
कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया ब्लॉक की सबसे बड़ी चुनौती अब आपसी एकता बनाए रखना है। विपक्षी दल संयुक्त उम्मीदवार उतारकर एनडीए को चुनौती देना चाहते थे, लेकिन राधाकृष्णन की उम्मीदवारी ने समीकरण बिगाड़ दिए हैं।
डीएमके के पास लोकसभा और राज्यसभा मिलाकर 32 सांसद हैं। उनका रुख इस चुनाव में अहम रहेगा। अगर डीएमके या शिवसेना ने अलग रुख अपनाया तो विपक्षी एकता कमजोर पड़ सकती है।
नतीजा: बीजेपी की रणनीति सफल होगी?
सीपी राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाकर बीजेपी ने विपक्षी खेमे में नई हलचल पैदा कर दी है। उद्धव ठाकरे से लेकर एमके स्टालिन तक सभी नेताओं के लिए यह फैसला आसान नहीं होगा। पिछले चुनावों की तरह इस बार भी एनडीए की रणनीति विपक्षी एकजुटता की परीक्षा लेगी।
आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा कि विपक्ष एकजुट रह पाता है या फिर बीजेपी का यह दांव एक बार फिर मास्टरस्ट्रोक साबित होता है।

