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कड़कड़ाती ठंड में नदी पार कर स्कूल जाते बच्चे: गुजरात के बनासकांठा में विकास के दावों की हकीकत

कड़कड़ाती ठंड में नदी पार कर स्कूल जाते बच्चे:

जान जोखिम में डालकर पढ़ाई करने को मजबूर बच्चे

गुजरात के बनासकांठा जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो विकास के दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। अमीरगढ़ तहसील के काकवाड़ा गांव और उसके आसपास के 5 से 7 गांवों के बच्चे रोजाना स्कूल जाने के लिए बनास नदी पार करने को मजबूर हैं। कड़ाके की ठंड हो या तेज बहाव, इन मासूम बच्चों के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है।


पुल न होने से बढ़ी परेशानी

इन गांवों के लिए स्कूल तक पहुंचने का यही एकमात्र रास्ता है। नदी के दोनों किनारों पर बसे गांवों के बच्चे और ग्रामीण इसी रास्ते से आवागमन करते हैं। सर्दियों में बर्फीले पानी से गुजरना और मानसून में उफनती नदी पार करना बच्चों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।

ग्रामीणों का कहना है कि बारिश के मौसम में हालात और भी खराब हो जाते हैं। कई बार तेज बहाव के कारण बच्चों को एक महीने तक स्कूल नहीं भेजा जा पाता। ऐसे में उनकी पढ़ाई लगातार प्रभावित हो रही है।


चार साल से अधूरी है पुल की मांग

स्थानीय लोगों के अनुसार, वे पिछले चार सालों से प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से पुल निर्माण की मांग कर रहे हैं। हर चुनाव के समय नेताओं द्वारा वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही ये वादे कागजों तक सिमट जाते हैं।

गांव माउंट आबू के पास स्थित होने के कारण यहां ठंड अधिक पड़ती है। इसके बावजूद छोटे-छोटे बच्चे ठंडे पानी में उतरकर स्कूल जाने को मजबूर हैं, जो किसी भी समय बड़े हादसे को न्योता दे सकता है।


2022 में हुआ शिलान्यास, अब तक नहीं बना पुल

ग्रामीणों ने बताया कि साल 2022 में बनास नदी पर पुल निर्माण का शिलान्यास किया गया था। उस समय प्रशासन और सरकार की ओर से भरोसा दिलाया गया था कि जल्द समस्या का समाधान होगा। लेकिन तीन साल से ज्यादा समय बीतने के बावजूद आज तक पुल का निर्माण शुरू नहीं हो सका।

लोगों का आरोप है कि शिलान्यास केवल राजनीतिक दिखावा था और जमीनी स्तर पर कोई काम नहीं हुआ।


आंदोलन और चुनाव बहिष्कार की चेतावनी

पुल न बनने से नाराज ग्रामीणों ने अब आंदोलन का रास्ता अपनाने की चेतावनी दी है। गांव वालों ने बनास नदी के किनारे बैठकर रामधुन का आयोजन किया और आने वाले सभी चुनावों के बहिष्कार की बात कही है। साथ ही, मांग पूरी न होने पर कलेक्टर कार्यालय पर बड़े धरने की चेतावनी भी दी गई है।


प्रशासन का दावा: तीन महीने में शुरू होगा काम

प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि पहले 4 करोड़ रुपये की लागत से कोजवे (कॉजवे) बनाने की योजना थी, लेकिन अब इसे बदलकर 19.50 करोड़ रुपये की लागत से एक बड़ा और पक्का पुल बनाया जाएगा। अधिकारियों के अनुसार, अगले तीन महीनों में पुल निर्माण का कार्य शुरू कर दिया जाएगा।


अब इंतजार या फिर हादसा?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब तक पुल नहीं बनता, तब तक बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा? बनासकांठा की यह तस्वीर बताती है कि आज भी देश के कई हिस्सों में बुनियादी सुविधाओं की कमी बच्चों की शिक्षा और जान दोनों पर भारी पड़ रही है।

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