गाबा का शेर: चेतेश्वर पुजारा की 56 रन की वो पारी जिसने भारत को दिलाई ऐतिहासिक जीत

'वॉल 2.0' की कमी हमेशा खलेगी

भारतीय क्रिकेट में चेतेश्वर पुजारा का नाम धैर्य, जुझारूपन और टीम के लिए संघर्ष की मिसाल के तौर पर लिया जाता है। राहुल द्रविड़ के संन्यास (2012) के बाद जब टेस्ट क्रिकेट में भारत के नंबर-3 बल्लेबाज की जगह खाली हुई, तब पुजारा ने उस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया। इसी वजह से उन्हें “वॉल 2.0” कहा जाने लगा।

अब 37 साल की उम्र में चेतेश्वर पुजारा ने 24 अगस्त 2025 को क्रिकेट के सभी फॉर्मेट से संन्यास की घोषणा कर दी। उनके करियर में कई यादगार पारियां रहीं, लेकिन जनवरी 2021 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ ब्रिस्बेन के गाबा मैदान पर खेली गई उनकी 56 रन की पारी हमेशा याद की जाएगी।


गाबा टेस्ट: जब गेंदबाजों की बॉडीलाइन रणनीति के सामने डटे रहे पुजारा

सीरीज़ का आखिरी और निर्णायक टेस्ट मैच गाबा में खेला जा रहा था। पांचवें दिन भारतीय टीम को जीत के लिए बड़ा लक्ष्य हासिल करना था। ऐसे में ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाजों ने बॉडीलाइन बॉलिंग शुरू कर दी। पिच से असमान उछाल मिल रही थी और हर गेंद पर खतरा था।

पुजारा क्रीज पर आए और पूरे संयम के साथ 211 गेंदों का सामना किया। इस दौरान उन्हें 11 बार गेंद लगी, लेकिन उन्होंने क्रीज नहीं छोड़ी। उनकी यह साहसिक पारी भारत की जीत की नींव बनी।


पुजारा को कब-कब लगी चोट?

गाबा टेस्ट की उनकी पारी को “योद्धा पारी” इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह बार-बार चोट खाते रहे, फिर भी टिके रहे।

  • पैट कमिंस की गेंदें: 6 बार (हेलमेट, पीठ, सीना, बाइसेप, जांघ और ग्लव्स पर)

  • मिचेल स्टार्क की गेंदें: 2 बार (ग्लव्स पर)

  • जोश हेजलवुड की गेंदें: 3 बार (ग्लव्स, कोहनी और हेलमेट पर)

कुल मिलाकर पुजारा को हेलमेट/गर्दन पर 2 बार, पीठ पर 2 बार, सीने पर 1 बार, जांघ पर 1 बार, बाइसेप पर 1 बार, कोहनी पर 1 बार और ग्लव्स पर 4 बार चोट लगी।

इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और डटे रहे।


क्यों खास थी ये 56 रन की पारी?

पुजारा की ये पारी भले ही केवल 56 रन की रही, लेकिन परिस्थितियों के हिसाब से यह किसी शतक से कम नहीं थी। उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों का सामना करते हुए ऋषभ पंत और शुभमन गिल जैसे युवा बल्लेबाजों के लिए रास्ता आसान किया।

ऋषभ पंत ने नाबाद 89 रन बनाए और भारत को गाबा में 3 विकेट से जीत दिलाई। इस जीत के साथ ही भारत ने बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी 2-1 से अपने नाम कर ली और ऑस्ट्रेलिया का गाबा में 32 साल से चला आ रहा अपराजेय रिकॉर्ड तोड़ दिया।


पुजारा का बयान: “मैंने शरीर से गेंदें झेलने का फैसला किया”

गाबा टेस्ट के बाद पुजारा ने कहा था कि उस पिच पर गेंद असमान उछाल ले रही थी। अगर वे बल्ले से खेलते तो कैच आउट होने का खतरा ज्यादा था। इसलिए उन्होंने जानबूझकर शरीर से गेंदें झेलने का फैसला किया। यही रणनीति टीम इंडिया की जीत का सबसे बड़ा कारण बनी।


पुजारा का करियर और उनकी खासियत

चेतेश्वर पुजारा का टेस्ट करियर इस बात का सबूत है कि क्रिकेट केवल आक्रामकता से नहीं, धैर्य और तकनीक से भी जीता जाता है।

  • वे भारत के इकलौते बल्लेबाज हैं, जिन्होंने किसी टेस्ट पारी में 500 से ज्यादा गेंदों का सामना किया है।

  • उन्होंने अपने करियर में कई बार लंबे समय तक बल्लेबाजी कर गेंदबाजों को थकाया।

  • उनकी शांत और धैर्यपूर्ण बल्लेबाजी ने भारत को विदेशों में कई ऐतिहासिक जीत दिलाई।

आज जब क्रिकेट में टी20 फॉर्मेट का दबदबा है, ऐसे में पुजारा जैसे धैर्यवान और तकनीकी रूप से मजबूत बल्लेबाज मिलना लगभग असंभव है।


निष्कर्ष: ‘वॉल 2.0’ की कमी हमेशा खलेगी

चेतेश्वर पुजारा का करियर यह बताता है कि क्रिकेट केवल रन बनाने का खेल नहीं, बल्कि टीम के लिए संघर्ष और त्याग का नाम भी है। गाबा की 56 रन की पारी उनका सबसे बड़ा योगदान मानी जाएगी, जिसने भारत को असंभव सी जीत दिलाई।

भारतीय ड्रेसिंग रूम में पुजारा जैसे बल्लेबाज की कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी।

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