मूसी नदी पुनर्विकास योजना के खिलाफ मधु पार्क रिज के निवासी एकजुट
तेलंगाना सरकार की महत्त्वाकांक्षी गांधी सरोवर परियोजना के विरोध में हैदराबाद के बंदलागुडा जागीर स्थित मधु पार्क रिज कॉलोनी के करीब 450 परिवार सड़क पर उतर आए हैं। यह परियोजना मूसी नदी के पुनरुद्धार और किनारों के बड़े पैमाने पर पुनर्विकास से जुड़ी है। योजना के तहत नदी किनारे 50 मीटर तक की जमीन अधिग्रहित की जानी है, जिससे इस गेटेड कम्युनिटी पर सीधा असर पड़ा है।
निवासियों को घर खाली करने के नोटिस जारी किए गए हैं, जिसके बाद उन्होंने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि वे विकास के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन अपने घरों के विध्वंस का विरोध करते हैं।
क्या है गांधी सरोवर परियोजना?
प्रस्तावित परियोजना तेलंगाना सरकार की मूसी नदी पुनरुद्धार पहल का हिस्सा है। इसके तहत नदी किनारे सौंदर्यीकरण, बुनियादी ढांचा विकास और महात्मा गांधी की एक विशाल प्रतिमा स्थापित करने की योजना है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट के लिए एशियाई विकास बैंक से 4,100 करोड़ रुपये से अधिक का ऋण लिया गया है।
सरकार का कहना है कि यह परियोजना शहर के पर्यावरण और पर्यटन को बढ़ावा देगी। हालांकि, प्रभावित परिवारों का कहना है कि परियोजना का सामाजिक प्रभाव आकलन सार्वजनिक नहीं किया गया है।
नकद मुआवजे की बजाय TDR बॉन्ड
सबसे बड़ा विवाद मुआवजे के मॉडल को लेकर है। सरकार प्रभावित परिवारों को नकद भुगतान के बजाय TDR (ट्रांसफरेबल डेवलपमेंट राइट्स) बॉन्ड दे रही है। प्रस्ताव के अनुसार, भूमि की आधार दर के 300% मूल्य के बराबर TDR बॉन्ड दिए जाएंगे।
लेकिन कई निवासियों का दावा है कि वर्तमान में TDR बाजार कमजोर है और बॉन्ड को कम कीमत पर बेचना पड़ रहा है। इससे उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
एक निवासी ने कहा, “अगर हमारा अपार्टमेंट तोड़ा गया, तो हमें किराए के घर में रहना पड़ेगा और TDR बॉन्ड बेचकर गुजारा करना होगा। पेंशनभोगियों और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह बेहद कठिन होगा।”
“विकास का मतलब विनाश नहीं”
प्रदर्शन के दौरान निवासियों ने सामूहिक बयान जारी करते हुए कहा,
“हम महात्मा गांधी या प्रतिमा निर्माण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन 450 परिवारों को उजाड़ना किस तरह का विकास है? प्रभाव आकलन रिपोर्ट कहां है? सार्वजनिक चर्चा क्यों नहीं हुई?”
उन्होंने कहा कि हैदराबाद में कई स्थानों पर खाली जमीन उपलब्ध है, जहां परियोजना विकसित की जा सकती है। बसे-बसाए परिवारों को हटाना आवश्यक नहीं है।
भावुक अपील और सामाजिक चिंता
विरोध प्रदर्शन के दौरान एक बुजुर्ग महिला ने भावुक अपील करते हुए कहा,
“अगर सरकार बुलडोजर चलाना चाहती है तो हम सब उसके नीचे सो जाएंगे। अपना घर खोने से बेहतर है मर जाना।”
निवासियों का कहना है कि यह केवल एक कॉलोनी का मुद्दा नहीं है, बल्कि भविष्य में अन्य आवासीय इलाकों पर भी इसका असर पड़ सकता है।
आगे क्या?
फिलहाल सरकार की ओर से आधिकारिक रूप से कोई नई घोषणा नहीं की गई है। प्रशासन का कहना है कि परियोजना शहर के दीर्घकालिक विकास के लिए जरूरी है। वहीं, प्रभावित परिवार मुआवजा नीति की समीक्षा और वैकल्पिक समाधान की मांग कर रहे हैं।
यह मामला अब शहरी विकास बनाम आवासीय अधिकारों की बहस का रूप लेता जा रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और निवासियों के बीच कोई सहमति बन पाती है या नहीं।