नदी में उतरकर अंतिम यात्रा: कंधों पर लाश, कमर तक पानी और लाचारी — आगर मालवा के गांव में पुलिया न होने से झकझोर देने वाला दृश्य

कंधों पर लाश, कमर तक पानी और लाचारी

बिना पुलिया के नदी पार कर शव यात्रा, तस्वीर ने उठाए प्रशासन पर सवाल

मध्यप्रदेश के आगर मालवा जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो विकास के तमाम दावों को शर्मसार करती है।
यह घटना लखमनखेड़ी गांव (ग्राम पंचायत जेतपुरा) की है, जहां एक 65 वर्षीय बुजुर्ग महिला के अंतिम संस्कार के लिए ग्रामीणों को नदी में उतरकर शव को कंधे पर उठाकर श्मशान घाट तक ले जाना पड़ा
पुलिया न होने के कारण ग्रामीणों को कमर तक भरे पानी में शव यात्रा निकालनी पड़ी, जिसने प्रशासन की लापरवाही की पोल खोल दी है।


पानी में उतरकर नदी पार ले गए बुजुर्ग महिला का शव

गांव की लीलाबाई (65 वर्ष) पत्नी रणजीत सिंह का निधन हो गया था।
अंतिम संस्कार के लिए परिजन और ग्रामीण शव यात्रा लेकर निकले, लेकिन श्मशान घाट नदी के दूसरी ओर होने और पुलिया न बने होने की वजह से सभी को पानी में उतरकर नदी पार करनी पड़ी।
ग्रामीणों ने अर्थी को सिर और कंधे पर उठाकर कमर तक पानी में चलकर श्मशान घाट तक पहुंचाया।
यह दृश्य किसी को भी झकझोर देने वाला था — जहां विकास के नाम पर करोड़ों खर्च हो रहे हैं, वहीं एक गांव में मृतक को भी सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार का अधिकार नहीं मिल रहा।


हर बारिश में दोहराई जाती है यही मजबूरी

गांववालों ने बताया कि यह कोई नई घटना नहीं है।
हर साल बरसात के मौसम में यही स्थिति बन जाती है।
जैसे ही नदी में पानी भरता है, गांव से श्मशान घाट का रास्ता बंद हो जाता है।
ऐसे में बीमार लोगों को अस्पताल ले जाना, या किसी का अंतिम संस्कार करना, दोनों ही काम मुश्किल हो जाते हैं।
ग्रामीणों ने कहा कि यह समस्या सालों से चली आ रही है, लेकिन प्रशासन ने अब तक इस पर कोई कदम नहीं उठाया।


ग्राम सरपंच ने भी स्वीकार की समस्या

ग्राम सरपंच रामकुंवर बाई पति नागुसिंह ने बताया,

“हमारे गांव में श्मशान घाट की जमीन नदी के दूसरी तरफ है। कई बार हमने विधायक और प्रशासन से पुलिया निर्माण की मांग की है, लेकिन अभी तक कोई सुनवाई नहीं हुई। बरसों से ग्रामीण इसी तरह नदी पार करके अंतिम संस्कार करने को मजबूर हैं।”

सरपंच के अनुसार, बारिश के दिनों में यह समस्या और बढ़ जाती है, क्योंकि नदी में पानी का स्तर बढ़ने पर रास्ता पूरी तरह डूब जाता है।


ग्रामीणों में आक्रोश, कहा — विकास योजनाएं सिर्फ कागजों में

घटना के बाद गांव में आक्रोश और मायूसी दोनों का माहौल है।
ग्रामीणों का कहना है कि आज़ादी के 75 साल बाद भी अगर किसी गांव में श्मशान घाट तक पहुंचने के लिए नदी पार करनी पड़े, तो यह प्रशासन की विफलता है।
उन्होंने कहा कि विकास के दावे सिर्फ कागजों और भाषणों तक सीमित हैं, जबकि हकीकत में लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।


पुलिया निर्माण की मांग को लेकर कई बार दिया गया आवेदन

स्थानीय लोगों ने बताया कि इस समस्या के समाधान के लिए ग्राम पंचायत स्तर से लेकर जिला प्रशासन तक कई बार आवेदन दिए गए।
विधायक और जनप्रतिनिधियों से मुलाकात भी की गई, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
ग्रामीणों का कहना है कि जब तक पुलिया नहीं बनेगी, तब तक हर बारिश में यही मजबूरी झेलनी पड़ेगी।


“कंधों पर लाश और आंखों में आंसू” — प्रशासन की चुप्पी बनी सवाल

घटना का वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गई हैं, जिन्हें देखकर हर कोई हैरान है।
लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या यही है ग्रामीण विकास का चेहरा?
कंधों पर लाश, पानी में भीगे कपड़े और आंखों में आंसू — यह तस्वीरें प्रशासन की संवेदनहीनता की गवाही दे रही हैं।


सरकार को तुरंत लेना चाहिए संज्ञान

स्थानीय सामाजिक संगठनों और ग्रामीणों ने राज्य सरकार से तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है।
उनका कहना है कि गांव में स्थायी पुलिया का निर्माण करवाया जाए ताकि आने वाले समय में किसी को भी इस तरह की शर्मनाक स्थिति से न गुजरना पड़े।


निष्कर्ष

आगर मालवा के लखमनखेड़ी गांव की यह घटना सिर्फ एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की अनदेखी का प्रतीक है।
जहां लोग विकास की उम्मीद में वोट देते हैं, वहीं अंतिम यात्रा के लिए भी नदी पार करनी पड़ती है।
यह घटना प्रशासन के लिए चेतावनी है कि विकास की असली तस्वीर जमीनी हकीकत में छिपी है, रिपोर्टों में नहीं।

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