पंजाब-जम्मू बाढ़ संकट: डैम, सीवर और रिवर मैनेजमेंट से क्या सीखे देश ने?

बाढ़ ने पंजाब को ‘अन्न भंडार’ से पानी का कटोरा बना दिया

भारत के 10% हिस्से में बाढ़ का खतरा

पिछले दस वर्षों में भारत बाढ़ का बड़ा केंद्र बन चुका है। 2014 से 2024 के बीच देश की कुल जमीन का करीब 10% हिस्सा यानी लगभग 3 लाख वर्ग किलोमीटर बाढ़ से प्रभावित हुआ। खासकर पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में भारी बारिश, कमजोर बांध और अतिक्रमण ने इस आपदा को और बढ़ाया।

पंजाब की बाढ़: 2025 की भयावह तस्वीर

2025 की बाढ़ ने पंजाब को ‘अन्न भंडार’ से पानी का कटोरा बना दिया।

  • 1902 गांव डूबे

  • 3.84 लाख लोग प्रभावित

  • 1.7 लाख हेक्टेयर फसलें बर्बाद

सतलज, ब्यास और रावी नदियों के उफान के साथ भाखड़ा, पोंग और रणजीत सागर बांधों से पानी छोड़े जाने के बाद गुरदासपुर, अमृतसर और फिरोजपुर सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। 5 सितंबर तक 43 लोगों की मौत दर्ज की गई और पूरे राज्य के 23 जिलों को बाढ़ प्रभावित घोषित किया गया।

क्यों बढ़ रही है बाढ़ की आपदा?

प्राकृतिक कारण

  • भारी बारिश: पंजाब में 30 अगस्त तक औसत से 24% अधिक बारिश हुई। हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में बादल फटने की घटनाओं से नदियां और खतरनाक स्तर तक बढ़ गईं।

  • जलवायु परिवर्तन: मॉनसून ट्रफ और पश्चिमी विक्षोभ के कारण बारिश और तीव्र हुई।

  • बांधों से पानी: बांधों में जलस्तर बढ़ने के बाद लाखों क्यूसेक पानी छोड़ना पड़ा, जिससे निचले इलाके डूब गए।

इंसानी लापरवाही

  • कमजोर बांध (धूंसी बांध): समय पर मरम्मत और मजबूती का काम नहीं हुआ।

  • नदियों पर अतिक्रमण: बाढ़ क्षेत्र में खेती और बस्तियां बस गईं।

  • सिल्ट जमा होना: नदियों और नहरों में गाद साफ न होने से जल निकासी कम हो गई।

  • पुरानी सीवरेज और नालों का बंद होना: शहरों में फ्लैश फ्लड की स्थिति बनी।

  • प्रबंधन में देरी: बांधों से पानी छोड़ने और चेतावनी देने में समय लगा।

बाढ़ से हुआ नुकसान

  • कृषि: धान सहित 1.7 लाख हेक्टेयर फसलें नष्ट, जिससे देश के खाद्य उत्पादन पर असर।

  • मानव और पशु हानि: 43 मौतें, कई लोग लापता और हजारों मवेशी बह गए।

  • बुनियादी ढांचा: घर, सड़कें, पुल और बिजली व्यवस्था डूब गई।

  • शहरी संकट: चंडीगढ़, लुधियाना, जालंधर और मोहाली जैसे शहरों में 1-3 सितंबर को भारी बारिश से जलभराव।

  • आर्थिक नुकसान: शुरुआती अनुमान 1700-2000 करोड़ रुपये, बाद में आधिकारिक रिपोर्ट में 1219 करोड़ रुपये बताया गया।

केंद्र और राज्य की खींचतान

बाढ़ को लेकर केंद्र और राज्य सरकार में मतभेद देखने को मिले। केंद्रीय जल आयोग (CWC) ने कहा कि पंजाब की नदियां ऐतिहासिक जलस्तर तक नहीं पहुंचीं, जबकि स्थानीय प्रशासन और मीडिया ने इसे 1988 के बाद सबसे बड़ी आपदा बताया। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने केंद्र से 60,000 करोड़ रुपये राहत पैकेज मांगा, लेकिन केंद्र ने कहा कि राज्य आपदा राहत कोष में पहले से राशि उपलब्ध है।

भविष्य के लिए सबक और समाधान

विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते कदम उठाए जाएं तो इस तरह की आपदाओं को रोका जा सकता है।

  • नदियों के किनारे अतिक्रमण रोकना

  • धूंसी बांधों को मजबूत करना और डी-सिल्टेशन करना

  • आईएमडी, सिंचाई विभाग और बीबीएमबी का संयुक्त प्लान

  • शहरी ड्रेनेज और सीवरेज सिस्टम को अपग्रेड करना

  • स्थानीय समुदाय और एनजीओ को राहत कार्यों में शामिल करना

  • जल्दी मुआवजा और स्वास्थ्य सेवाएं देना

निष्कर्ष

पंजाब-जम्मू और उत्तरी भारत की हालिया बाढ़ यह दिखाती है कि प्राकृतिक आपदा और इंसानी लापरवाही का मेल कितना खतरनाक हो सकता है। अगर बांध मजबूत किए जाएं, नदियों की सफाई हो और बेहतर चेतावनी सिस्टम लागू किया जाए, तो लाखों जिंदगियां और अरबों की संपत्ति बचाई जा सकती है।

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