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बॉलीवुड एक्टर अच्युत पोतदार का निधन: 91 साल की उम्र में ली अंतिम सांस, 125 से ज्यादा फिल्मों में किया काम

91 साल की उम्र में ली अंतिम सांस, 125 से ज्यादा फिल्मों में किया काम

मुंबई: सिनेमा और टेलीविजन जगत से एक दुखद खबर सामने आई है। दिग्गज अभिनेता अच्युत पोतदार का 91 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। 18 अगस्त को उन्हें उम्र संबंधी बीमारियों के चलते ठाणे स्थित एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली। आज उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार किया जाएगा।


अच्युत पोतदार: बहुमुखी अभिनेता जिनका सफर रहा यादगार

अच्युत पोतदार ने अपने लंबे अभिनय करियर में 125 से अधिक फिल्मों में काम किया। हिंदी के साथ-साथ मराठी और अन्य भाषाओं की फिल्मों में भी उन्होंने अपनी पहचान बनाई। उनकी अदाकारी ने दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई।

वे अपनी नैचुरल एक्टिंग और हर किरदार में ढल जाने की कला के लिए जाने जाते थे। उनके काम की झलक ‘अर्ध सत्य’, ‘तेजाब’, ‘दिलवाले’, ‘वास्तव’, ‘परिणीता’, ‘दबंग’, ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ और ‘3 इडियट्स’ जैसी फिल्मों में देखने को मिली।


‘3 इडियट्स’ से मिला अलग पहचान

आमिर खान स्टारर सुपरहिट फिल्म ‘3 इडियट्स’ में अच्युत पोतदार ने प्रोफेसर का किरदार निभाया था। फिल्म में उनका डायलॉग “अरे कहना क्या चाहते हो” आज भी दर्शकों के बीच मशहूर है। भले ही उनका रोल छोटा था, लेकिन उनके अभिनय ने गहरी छाप छोड़ी।


सेना और कॉर्पोरेट सेक्टर से लेकर अभिनय तक का सफर

अभिनय की दुनिया में कदम रखने से पहले अच्युत पोतदार का जीवन बेहद प्रेरणादायक रहा।

44 वर्ष की उम्र में उन्होंने फिल्मों में अभिनय की शुरुआत की और 80 के दशक से लेकर आगे के वर्षों तक बड़े पर्दे पर अपनी एक्टिंग का जलवा बिखेरा।


टेलीविजन पर भी छोड़ी छाप

फिल्मों के अलावा अच्युत पोतदार ने टीवी पर भी शानदार काम किया।
उन्होंने ‘वागले की दुनिया’, ‘मिसेज तेंदुलकर’, ‘माझा होशिल ना’ और ‘भारत की खोज’ जैसे धारावाहिकों में अभिनय किया। उनका मानना था कि छोटा या बड़ा रोल मायने नहीं रखता, बल्कि अभिनय से दर्शकों के दिल जीतना अहम है।


फिल्म इंडस्ट्री और फैंस में शोक की लहर

अच्युत पोतदार के निधन की खबर से फिल्म इंडस्ट्री और उनके चाहने वालों में शोक की लहर दौड़ गई है। सोशल मीडिया पर फैंस और सहकर्मी कलाकार उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं।


निष्कर्ष

अच्युत पोतदार न केवल एक अभिनेता थे, बल्कि एक प्रेरणादायक शख्सियत भी थे जिन्होंने सेना, कॉर्पोरेट और अभिनय—तीनों क्षेत्रों में अपनी छाप छोड़ी। उनका जाना हिंदी और मराठी सिनेमा के लिए एक बड़ी क्षति है।

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