विभाजन का दर्द: महिलाएं बनीं हिंसा का शिकार
1947 का भारत-पाक विभाजन भारतीय इतिहास का एक काला अध्याय है, जिसमें लाखों लोगों ने अपनों को खोया, अपनी पहचान खो दी और अपने घरों से पलायन किया। इस त्रासदी की सबसे बड़ी कीमत महिलाओं और बच्चों ने चुकाई। विभाजन के दौरान 80,000 महिलाओं को अगवा किया गया, जिनमें से कई का जबरन धर्म परिवर्तन किया गया, और कईयों के साथ अमानवीय अत्याचार किए गए। विभाजन ने महिलाओं के लिए न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक पीड़ा भी उत्पन्न की।
विभाजन के बाद महिलाओं की स्थिति और ‘कंबाइंड ऑपरेशन’
विभाजन के बाद, जब भारत और पाकिस्तान के बीच सीमाओं की लकीर खींची गई, तो दोनों देशों के बीच बड़ी संख्या में विस्थापन हुआ। महिलाओं की स्थिति बेहद असुरक्षित थी। दोनों देशों में होने वाले कट्टरपंथी हमलों और हिंसा ने महिलाओं को खासतौर पर निशाना बनाया। कई परिवारों ने अपनी बहनों, बेटियों और माताओं को सिर्फ इसलिए मार दिया या मरने के लिए मजबूर कर दिया, ताकि उनकी अस्मिता बची रहे। वहीं, कई महिलाओं को अगवा कर लिया गया और उनका शारीरिक और मानसिक शोषण किया गया।

थोआ खालसा गांव की त्रासदी
मार्च 1947 की एक दोपहरी में थोआ खालसा गांव में 90 सिख महिलाएं एक साथ जमा हुईं। वे अपनी जान बचाने के लिए कुएं में कूद गईं क्योंकि उनके पास केवल दो विकल्प थे— या तो उन्हें अपहरण और बलात्कार का शिकार होना था, या फिर अपनी अस्मिता को बचाते हुए मौत को गले लगाना था। सभी महिलाओं ने एक-एक कर कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली। इस दुखद घटना को देखने के बाद, उनके आसपास मौजूद लोग जय श्री राम के नारे लगाने लगे, जबकि कुएं में तैरती लाशें उनके आंसू और दर्द का प्रतीक बन गईं।
सरहदी लकीर और कंबाइंड ऑपरेशन
विभाजन के समय सरहदी नक्शा जारी होने के बाद, भारत और पाकिस्तान के बीच दुनिया के सबसे बड़े पलायन का दौर शुरू हुआ। अफवाहों और कयासों का बाजार गर्म था, और किसी को नहीं पता था कि वह किस मुल्क में होगा। विभाजन ने एक ही दिन में लाखों परिवारों को उनके घरों से उखाड़ दिया। यह संघर्ष और असुरक्षा की स्थिति खासतौर पर महिलाओं और बच्चों के लिए विकट हो गई।
इसके बाद, सितंबर 1947 में भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री, पंडित नेहरू और लियाकत अली खान की लाहौर में मुलाकात हुई। इससे शुरू हुआ “कंबाइंड ऑपरेशन”— एक संयुक्त ऑपरेशन जिसका उद्देश्य दोनों देशों से अगवा की गई महिलाओं को उनके परिवारों से मिलाना था। इस ऑपरेशन को Inter Dominion Treaty कहा गया।

कंबाइंड ऑपरेशन: महिलाओं को उनके परिवारों से मिलाने की कोशिश
1947 से 1957 तक चलने वाले इस ऑपरेशन के दौरान, भारत और पाकिस्तान की टीमों ने दोनों देशों में जाकर उन महिलाओं की तलाश शुरू की, जिन्हें विभाजन के दौरान अगवा किया गया था। इस ऑपरेशन के तहत, भारत से 50,000 मुस्लिम महिलाएं और पाकिस्तान से 30,000 हिंदू महिलाएं अगवा की गई थीं, जिनमें से कई का धर्म परिवर्तन भी कर दिया गया था।
इन महिलाओं को खोजने के लिए दोनों देशों ने एक विशेष ट्रिब्यूनल का गठन किया था। इस ट्रिब्यूनल के पास यह अधिकार था कि वह तय कर सके कि किस महिला को उनके मूल देश भेजा जाए और किसे नहीं।
महिलाओं के लिए लौटना था मुश्किल
अधिकांश महिलाओं के लिए वापस अपने देश लौटना बहुत कठिन था। कुछ महिलाएं जिनका धर्म परिवर्तन कर दिया गया था, या फिर उन्होंने मजबूरी में अपने अपहरणकर्ताओं से विवाह कर लिया था, उनके लिए अपनी नई जिंदगी और परिवार को छोड़ना आसान नहीं था। अमीना और सुखवंत कौर जैसी महिलाओं की दास्तानें इस दर्द को बयां करती हैं।
अमीना ने भारत से पाकिस्तान भेजे जाने के दौरान कहा, “कौन सा घर? मेरे पति और बच्चे अब यहां हैं। अब पाकिस्तान में मेरे लिए क्या है?” वहीं, सुखवंत कौर, जो भारत से पाकिस्तान भेजी गई थीं, जब वापसी पर आईं, तो उन्हें उनके अपने ही परिवार ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया, क्योंकि उन्होंने अपनी अस्मिता और धर्म बदल लिया था।
महिलाओं की इन दास्तानों को क्यों भूल गया समाज?
उर्वशी बुटालिया ने अपनी किताब “The Other Side of Silence” में विभाजन के दौरान महिलाओं की दुर्दशा का जिक्र करते हुए बताया कि 1.2 करोड़ लोग विस्थापित हुए, और 75,000 महिलाएं बलात्कार का शिकार हुईं या फिर उन्हें जबरन धर्मांतरित किया गया। विभाजन के समय इन महिलाओं की दर्दनाक कहानियां किसी भी इतिहास में शामिल नहीं की गईं। इनका दर्द और शोषण समाज द्वारा पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया।
कंबाइंड ऑपरेशन की सच्चाई: महिलाओं का दर्द कभी ना भरने वाला जख्म
अनीस किदवई, जिन्होंने In Freedom’s Shade में इस ऑपरेशन के अनुभवों का उल्लेख किया है, बताते हैं कि महिलाओं को उनके परिवारों से मिलाना कभी आसान नहीं था। अनीस किदवई के अनुसार, “हमें हथियारों के साये में गालियां और धमकियां झेलते हुए काम करना पड़ता था। लेकिन जब हम किसी महिला को उसके परिवार के पास भेजते, तो उसकी आंखों में लौटी हुई चमक हमें हिम्मत देती थी।”

निष्कर्ष: महिलाओं की पीड़ा को याद रखें
भारत-पाक विभाजन के दौरान महिलाओं ने जो त्रासदी झेली, वह सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि यह मानवाधिकारों का उल्लंघन था। इन महिलाओं ने न केवल अपनी आध्यात्मिक पहचान खोई, बल्कि उनके शरीर पर अत्याचार किए गए और उन्हें समाज ने कभी स्वीकार नहीं किया। इनकी कहानियां हमें यह याद दिलाती हैं कि विभाजन के समय उन महिलाओं और बच्चों को कभी नहीं भुलाया जा सकता, जिनका दर्द आज भी दिलों में है।
One thought on “भारत-पाक विभाजन: महिलाओं की त्रासदी और “कंबाइंड ऑपरेशन” का इतिहास”