सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सिंचाई विभाग ने जारी किया नोटिस
मथुरा के कृष्णानगर और हाईवे क्षेत्र में गोवर्धन ड्रेनेज नाले की जमीन पर बने 300 अवैध मकानों को ध्वस्त करने की तैयारी पूरी हो गई है। सिंचाई विभाग ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में इन घरों पर सात दिन का अल्टीमेटम जारी किया है। विभाग की ओर से 20 जनवरी को लाल निशान लगाकर अंतिम चेतावनी दी गई थी।
यह कदम गोवर्धन ड्रेनेज नाले की पटरी पर वर्षों से अवैध निर्माण रोकने के लिए उठाया गया है। हालांकि, स्थानीय लोग और परिवार इससे नाराज हैं और उन्हें डर है कि उनके 80 साल पुराने घर अब नष्ट हो सकते हैं।
वर्षों पुराना कब्जा और सुप्रीम कोर्ट की सख्ती
सिंचाई विभाग के जूनियर इंजीनियर पंजाबी शर्मा ने बताया कि यह जमीन अपर खंड आगरा नहर मथुरा की है। नाले की पटरी पर लंबे समय से लोग पक्के मकान बना चुके हैं। विभाग ने पहले भी चार बार नोटिस जारी किए थे, लेकिन कार्रवाई टलती रही।
सुप्रीम कोर्ट के सीधे हस्तक्षेप के बाद अब विभाग ने कार्रवाई को टालने का विकल्प नहीं रखा। सभी अवैध मकानों की नंबरिंग कर 7 दिन के भीतर कब्जा हटाने की अंतिम चेतावनी दी गई।
स्थानीय निवासियों का विरोध
स्थानीय लोगों का कहना है कि वे यहाँ पिछले 80 वर्षों से रह रहे हैं और उनके पास वैध दस्तावेज हैं। उनका तर्क है कि जब मकान बन रहे थे, तब विभाग ने कोई रोक नहीं लगाई और अब अचानक उन्हें बेदखल करने की धमकी दी जा रही है।
स्थानीय लोग प्रदर्शन कर रहे हैं और स्पष्ट किया है कि वे अपना घर छोड़कर नहीं जाएंगे। उनका कहना है कि प्रशासन की यह कार्रवाई सामाजिक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील है।
क्या रुक पाएगी विध्वंस की कार्रवाई?
फिलहाल 28 जनवरी तक कोई मशीनी तोड़फोड़ शुरू नहीं हुई है, लेकिन विभाग की तैयारी पूरी है। नोटिस की अवधि समाप्त हो चुकी है और अधिकारी किसी भी समय भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंच सकते हैं।
पीड़ित परिवार कानूनी राहत या राजनीतिक हस्तक्षेप की उम्मीद लगाए हुए हैं। प्रशासन के लिए चुनौती यह है कि वह बिना विवाद के संवेदनशील क्षेत्र से अतिक्रमण हटाए।
विशेष चुनौती और सामाजिक असर
यह मामला मथुरा प्रशासन के लिए सबसे संवेदनशील मामलों में से एक है।
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300 परिवार लंबे समय से इस इलाके में रह रहे हैं।
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80 साल पुराने घरों को तोड़ना सामाजिक विवाद पैदा कर सकता है।
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प्रशासन को कानूनी और मानवीय संतुलन बनाए रखना है।
स्थानीय लोग अपने घर बचाने के लिए विधिक लड़ाई और जन आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं। वहीं, विभाग का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करना अनिवार्य है।
निष्कर्ष
मथुरा के कृष्णानगर और हाईवे इलाके में अवैध निर्माण हटाने का मामला सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, स्थानीय विरोध और प्रशासनिक चुनौती का ज्वलंत उदाहरण है।
यह देखना बाकी है कि विभाग कानून और सामाजिक संवेदनाओं के बीच संतुलन बनाए रखते हुए इस विवाद को कैसे हल करता है।
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