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मुंबई मेट्रो हादसा: लोहे की रॉड से यात्री की मौत, हाईकोर्ट ने BMC और राज्य सरकार से मांगी सुरक्षा रिपोर्ट

लोहे की रॉड से यात्री की मौत

हादसे ने खड़ा किया सुरक्षा पर सवाल

मुंबई में ठाणे-भिवंडी-कल्याण मेट्रो लाइन के निर्माण स्थल पर हुआ दर्दनाक हादसा शहरवासियों को झकझोर गया है। निर्माण स्थल से गिरी लोहे की रॉड ऑटो रिक्शा में सवार एक यात्री के सिर को चीरते हुए आर-पार हो गई। गंभीर चोट लगने से यात्री की मौके पर ही मौत हो गई। इस घटना के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सख्त रुख अपनाया है।


हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

जस्टिस जी.एस. कुलकर्णी और जस्टिस आरिफ एस. डॉक्टर की खंडपीठ ने इस हादसे को गंभीर लापरवाही का परिणाम बताते हुए कहा कि अगर किसी व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से चलने के दौरान इस बात का भय हो कि उस पर कोई वस्तु गिर सकती है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक सुरक्षा से किसी भी तरह का समझौता अस्वीकार्य है।


2023 की पुरानी याचिका पर फिर सुनवाई

यह मामला 2023 में लोखंडवाला रेजिडेंसी टावर्स को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी द्वारा दायर एक याचिका से जुड़ा है। उस समय याचिका में ऊंची इमारतों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाली क्रेनों और उपकरणों से होने वाले संभावित खतरों की ओर ध्यान आकर्षित किया गया था।
कोर्ट ने तब विशेषज्ञ समिति गठित कर सुरक्षा दिशानिर्देश बनाने के निर्देश दिए थे, ताकि निर्माण स्थलों पर लोगों की जान को खतरे से बचाया जा सके।


हादसा टल सकता था

हाईकोर्ट ने कहा कि अगर 2023 में बनाई गई समिति की सुरक्षा गाइडलाइंस को समय पर सभी नगर निकायों और नियोजन प्राधिकरणों तक पहुंचाया गया होता और उन पर अमल किया गया होता, तो इस तरह का हादसा टाला जा सकता था। अदालत ने मीडिया रिपोर्ट्स और तस्वीरों का हवाला देते हुए कहा कि कई बार निर्माण स्थलों के नीचे से यातायात और लोग बिना किसी सुरक्षा उपाय के गुजरते हैं, जिससे जानमाल का गंभीर खतरा बना रहता है।


BMC और राज्य सरकार को नोटिस

हाईकोर्ट ने बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) को निर्देश दिया है कि विशेषज्ञ समिति की सुरक्षा गाइडलाइंस को रिकॉर्ड पर लाया जाए। साथ ही, राज्य सरकार को आदेश दिया गया है कि वह जनहित में इन सिफारिशों पर जल्द कार्रवाई करे। अदालत ने कहा कि यह केवल एक व्यक्ति की जान जाने का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे शहर में निर्माण कार्यों के दौरान लागू सुरक्षा मानकों की विफलता को दर्शाता है।


अगली सुनवाई 12 अगस्त को

मामले की अगली सुनवाई 12 अगस्त को होगी, जिसमें कोर्ट उम्मीद कर रहा है कि BMC और राज्य सरकार दोनों विस्तृत रिपोर्ट पेश करेंगे। कोर्ट ने साफ कहा कि निर्माण स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कठोर कदम उठाए जाने चाहिए, ताकि भविष्य में किसी निर्दोष व्यक्ति की जान न जाए।


जनता में आक्रोश

इस हादसे के बाद स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में आक्रोश है। उनका कहना है कि मेट्रो और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में सुरक्षा मानकों की अनदेखी आम बात बन चुकी है। लोगों ने मांग की है कि जिम्मेदार ठेकेदारों और अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।


निष्कर्ष

मुंबई जैसे व्यस्त और घनी आबादी वाले शहर में निर्माण कार्य के दौरान सुरक्षा मानकों का पालन करना केवल कानूनी बाध्यता ही नहीं, बल्कि जनहित में आवश्यक है। यह हादसा एक चेतावनी है कि लापरवाही की कीमत इंसानी जान से चुकानी पड़ सकती है। अब देखना होगा कि हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद BMC और राज्य सरकार इस मामले में कितनी गंभीरता दिखाती है।

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