नर्स से इंसानियत की सेवा, पर बना दी गई आतंक का निशाना
कश्मीर के अनंतनाग की रहने वाली सरला भट्ट एक कश्मीरी पंडित थीं और पेशे से एक नर्स। उन्होंने श्रीनगर के प्रसिद्ध मेडिकल संस्थान में सेवा शुरू की। अपनी कोमल मुस्कान और मरीजों के प्रति समर्पण के लिए सरला को सभी जानने लगे थे। लेकिन उस दौर में घाटी में आतंकवाद अपने चरम पर था और कश्मीरी हिंदुओं को जान से मारने या घाटी छोड़ने की धमकियां दी जा रही थीं।
आतंकियों की निगाह में आई सरला
आतंकी संगठनों को शक था कि सरला भट्ट पुलिस की सूचनाकर्ता हैं। बार-बार उन्हें नौकरी छोड़ने या घाटी से जाने की धमकी दी जा रही थी। लेकिन सरला डरी नहीं। उन्होंने अपने कर्तव्य का पालन जारी रखा।
14 अप्रैल 1990 को आतंकियों ने उन्हें अस्पताल के हॉस्टल से अगवा कर लिया। इसके बाद चार दिन तक उन्हें एक अज्ञात स्थान पर बंधक बनाकर अमानवीय यातनाएं दी गईं और सामूहिक दुष्कर्म किया गया।
डाउनटाउन श्रीनगर में मिली लाश
19 अप्रैल को श्रीनगर के डाउनटाउन इलाके में एक युवती का क्षत-विक्षत शव बरामद हुआ। शरीर पर गोलियों के निशान थे और साफ देखा जा सकता था कि उसके साथ किस तरह की क्रूरता की गई है। शव के पास एक हाथ से लिखा नोट मिला, जिसमें उसे ‘पुलिस मुखबिर’ बताया गया था। यह शव किसी और का नहीं, सरला भट्ट का था।
अंतिम संस्कार में भी मिला आतंक
जब सरला के परिजन उनका अंतिम संस्कार करने जा रहे थे, तब भी आतंकियों ने हमला किया। उनके घर को आग के हवाले कर दिया गया। आखिरकार, उनके परिवार को वह करना पड़ा जो हजारों कश्मीरी पंडित परिवारों ने किया—घाटी से पलायन।
सरला भट्ट की हत्या इंसानियत के खिलाफ एक वीभत्स अपराध थी, जिसकी याद आज भी कश्मीरी पंडित समुदाय को दर्द देती है।
35 साल बाद फिर खुली फाइल
सरला भट्ट हत्याकांड की जांच 35 साल तक ठंडी पड़ी रही। लेकिन अब राज्य की जांच एजेंसी ने इस मामले को दोबारा खोला है। हाल ही में इस केस से जुड़े कई स्थानों पर छापेमारी की गई है। कुछ पूर्व आतंकियों और अलगाववादियों के घरों की तलाशी ली गई, जिन पर इस कांड से जुड़ा होने का संदेह है।
इस कार्रवाई के दौरान कई अहम दस्तावेज़ और डिजिटल सबूत मिले हैं, जो अब जांच का हिस्सा बन चुके हैं। इससे उम्मीद जगी है कि इस जघन्य अपराध में शामिल लोगों को सजा मिलेगी।
यह केस क्यों है ज़रूरी?
सरला भट्ट की हत्या केवल एक महिला की हत्या नहीं थी। यह उस दौर की गवाही है जब हजारों कश्मीरी पंडितों को अपने ही देश में शरणार्थी बनना पड़ा।
यह केस प्रतीक है उस अन्याय का, जिसे दशकों तक अनदेखा किया गया। लेकिन अब उम्मीद है कि सच्चाई सामने आएगी और न्याय मिलेगा।
निष्कर्ष
सरला भट्ट की कहानी उस हर महिला की कहानी है जो मुश्किल हालात में भी डटी रहती है। यह घटना हमें याद दिलाती है कि आतंक केवल जान नहीं लेता, वह आत्मा को भी चोट पहुंचाता है।
35 साल बाद भले देर हुई हो, लेकिन न्याय की यह नई पहल उन सभी लोगों के लिए आशा की किरण है जो अब भी अपने जख्मों के साथ न्याय की राह देख रहे हैं।
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