उत्तर भारत में तबाही का मंजर
उत्तर भारत इस समय पिछले चार दशकों की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा से जूझ रहा है। हिमाचल प्रदेश, पंजाब और जम्मू-कश्मीर में लगातार बारिश और बादल फटने की घटनाओं ने 400 से अधिक लोगों की जान ले ली है। वहीं, शुरुआती अनुमान के अनुसार, 30,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का आर्थिक नुकसान हुआ है।
72 घंटे में रिकॉर्ड तोड़ बारिश
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के मुताबिक, अगस्त के अंतिम हफ्ते में सिर्फ 72 घंटों में 300-350 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो सामान्य से तीन गुना अधिक है। इस भारी बारिश ने नदियों को उफान पर ला दिया और कई जिलों को जलमग्न कर दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बाढ़ पिछले 40 सालों की सबसे विनाशकारी मानी जा रही है।
हिमाचल प्रदेश में सबसे ज्यादा तबाही
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू, मंडी और किन्नौर जिले भूस्खलन और बादल फटने से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए।
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250 से अधिक सड़कें बह गईं, जिनमें चंडीगढ़-मनाली राजमार्ग का हिस्सा भी शामिल है।
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सतलुज पर नाथपा झकरी जैसे बड़े जलविद्युत संयंत्र बंद करने पड़े।
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सेब की बागवानी को बड़ा नुकसान हुआ, करीब 10,000 हेक्टेयर जमीन बर्बाद हो गई।
31 अगस्त तक हिमाचल में 220 से अधिक मौतें और 12,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान दर्ज किया गया।
जम्मू-कश्मीर में बर्बादी
जम्मू-कश्मीर में चिनाब और झेलम नदियों का जलस्तर खतरनाक स्तर तक पहुंच गया।
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राजौरी और पूंछ में कई पुल टूट गए, जिससे गांव कट गए।
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करीब 40,000 घर और 90,000 हेक्टेयर धान की फसल बर्बाद हो गई।
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शुरुआती अनुमान के अनुसार, राज्य को 6,500 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।
पंजाब के 1800 गांव जलमग्न
पंजाब में भी बाढ़ का कहर देखने को मिला।
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भाखड़ा नांगल बांध से छोड़े गए पानी और नदियों के उफान ने 1800 गांवों को जलमग्न कर दिया।
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250,000 हेक्टेयर खेत डूब गए और करीब 9,000 करोड़ रुपये की फसलें नष्ट हो गईं।
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जालंधर और कपूरथला में पोल्ट्री फार्मों में 10 लाख से अधिक पक्षियों की मौत हुई।
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120,000 से ज्यादा घर क्षतिग्रस्त हो गए।
पंजाब का औद्योगिक हब लुधियाना भी प्रभावित हुआ है, जहां 30,000 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान दर्ज किया गया।
30,000 करोड़ से अधिक का कुल नुकसान
केंद्र और राज्य सरकारों की शुरुआती रिपोर्ट के मुताबिक, हिमाचल, पंजाब और जम्मू-कश्मीर में कुल मिलाकर 30,000 करोड़ रुपये से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ है। केंद्र ने फिलहाल 3,000 करोड़ रुपये की अंतरिम राहत जारी की है, लेकिन अधिकारियों का मानना है कि पुनर्निर्माण के लिए इससे कई गुना ज्यादा राशि की जरूरत होगी।
आपदा के पीछे कारण
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तबाही के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं:
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जलवायु परिवर्तन और बढ़ता ग्लोबल वॉर्मिंग
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पहाड़ों में वनों की कटाई और खनन
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नदी तटों और बाढ़ के मैदानों पर अनियोजित निर्माण
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तेजी से पिघलते ग्लेशियर और रुका हुआ मानसून
मौसम वैज्ञानिक बताते हैं कि बंगाल की खाड़ी से आई नमी भरी हवाओं और पश्चिमी विक्षोभ के मिलन से पहाड़ों में बादल फटे और मैदानी इलाकों में मूसलाधार बारिश हुई।
जान गंवाने वालों की संख्या 400 पार
इस आपदा में अब तक 400 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और लाखों लोग बेघर हो गए हैं। स्कूल-कॉलेज बंद हैं और राहत शिविरों में भारी भीड़ है। स्वास्थ्य विभाग ने जलजनित बीमारियों का खतरा भी जताया है।
बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं की चेतावनी
जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि पहले जो आपदाएं 50 साल में एक बार आती थीं, अब हर कुछ सालों में दोहराई जा रही हैं। हिमालय वैश्विक औसत से दोगुनी तेजी से गर्म हो रहा है और इससे भविष्य में और भी ज्यादा बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाएगा।

