भोपाल की 29 वर्षीय अर्चना तिवारी, जो वकालत की पढ़ाई कर चुकी थीं और जज बनने की तैयारी कर रही थीं, ने अपनी शादी से बचने के लिए खुद को गायब करने का एक फुलप्रूफ प्लान बनाया। ट्रेन से फरार होना, कपड़े बदलना, मोबाइल जंगल में फेंकना और नेपाल तक पहुंच जाना—सब कुछ उन्होंने बड़ी सोच-समझ के साथ किया। लेकिन 12 दिन तक चली इस गुमशुदगी की कहानी में उन्होंने हर कदम पर छोटे-छोटे सुराग छोड़े, जिन्हें पुलिस ने जोड़कर उनकी पूरी साजिश का पर्दाफाश कर दिया।
गुमशुदगी की शुरुआत
11 अगस्त को अर्चना अचानक लापता हो गईं। शुरुआती जांच में मामला रहस्यमयी लगा। परिवार और पुलिस को लगा कि कोई बड़ी वारदात हुई है। लेकिन जब कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) खंगाले गए तो कई राज खुलने लगे।
छोड़े गए सुराग और पुलिस की पड़ताल
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मोबाइल कॉल्स: अर्चना ने मोबाइल भले ही जंगल में फेंक दिया था, लेकिन गुमशुदगी से पहले की गई कॉल्स ने पुलिस को बड़ा सुराग दिया। उनके सीडीआर में शुजालपुर निवासी सारांश से लंबी बातचीत दर्ज मिली।
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मोबाइल यूज में कमी: गुमशुदगी से 10 दिन पहले अर्चना ने अचानक फोन का इस्तेमाल कम कर दिया। उनके जैसी एक्टिव लड़की का यह बदलाव पुलिस को संदिग्ध लगा।
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सीसीटीवी फुटेज: पुलिस ने भोपाल से इटारसी और आगे तक 500 से ज्यादा सीसीटीवी फुटेज खंगाले। अर्चना कार में लेटकर कैमरों से बचना चाहती थीं, लेकिन कुछ जगह उनकी गाड़ी पकड़ी गई।
शुजालपुर में किराए का कमरा
जांच में यह भी सामने आया कि अर्चना ने शुजालपुर में किराए पर कमरा ले रखा था। यह संकेत था कि वह गुमशुदगी के दौरान वहीं ठहरने की योजना बना रही थीं। लेकिन मामला मीडिया में आने के बाद उन्होंने जगह बदल ली।
ड्राइवर तेजेंद्र की भूमिका
अर्चना का ड्राइवर तेजेंद्र, जो अक्सर उन्हें आउटस्टेशन लेकर जाता था, इस प्लान में शामिल पाया गया। उसी ने उनके कपड़े और मोबाइल जंगल में फेंके। बाद में दिल्ली पुलिस ने तेजेंद्र को एक अन्य केस में पकड़ा और जीआरपी ने उससे पूछताछ कर कई अहम बातें उजागर कीं।
नेपाल तक पहुंची अर्चना
सारांश और अर्चना की मोबाइल लोकेशन ने पुलिस को नेपाल तक पहुंचाया। जांच से पता चला कि दोनों 14 अगस्त को नेपाल बॉर्डर तक चले गए थे। पुलिस ने जब सारांश को पकड़कर पूछताछ की तो उसने पूरा राज खोल दिया।
70 सदस्यीय टीम ने की जांच
रेल एसपी राहुल कुमार लोधा के मुताबिक, अर्चना को लगा कि जीआरपी स्तर की जांच में उसका भेद नहीं खुलेगा। लेकिन 70 पुलिसकर्मियों की टीम ने लगातार मेहनत कर सैकड़ों सीसीटीवी फुटेज खंगाले, कॉल रिकॉर्ड्स चेक किए और हर स्टेशन की पड़ताल की। जितना अर्चना ने खुद को छिपाने की कोशिश की, उतना ही वह सुराग छोड़ती गईं।
आखिरकार खुल गया राज
करीब 12 दिन तक पुलिस और परिवार को गुमराह करने के बाद अर्चना की योजना धराशायी हो गई। सारांश के कबूलनामे के बाद अर्चना नेपाल बॉर्डर से परिवार से संपर्क करने पर मजबूर हुईं। बाद में उन्हें दिल्ली होते हुए भोपाल लाया गया।
शादी से बचने के लिए पूरा खेल
पुलिस के अनुसार, अर्चना ने यह सब केवल शादी से बचने के लिए किया था। उन्हें लगा कि वकालत और कानून की समझ के दम पर वह पुलिस को आसानी से चकमा दे देंगी। लेकिन उनकी हर चाल ने उन्हें और ज्यादा उजागर कर दिया।
निष्कर्ष
अर्चना तिवारी का केस यह साबित करता है कि चाहे योजना कितनी भी मजबूत क्यों न हो, छोटे-छोटे सुराग सच सामने ले ही आते हैं। कानून से बचने की कोशिश करने वाली अर्चना अंततः कानून के घेरे में ही आ गईं।
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