भागलपुर दंगा 1989 — बिहार के इतिहास का सबसे भयानक अध्याय, जिसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। करीब 250 गांव राख में बदल गए, 1800 से ज्यादा लोग मारे गए, और हजारों परिवार हमेशा के लिए उजड़ गए। आज 36 साल बाद भी उस नरसंहार की चीखें बिहार की मिट्टी से उठती हैं, क्योंकि इंसाफ अब भी अधूरा है।
राम मंदिर आंदोलन की गर्मी और फतेहपुर की चिंगारी
अक्टूबर 1989। देशभर में राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था। 24 अक्टूबर की सुबह भागलपुर में मंदिरों की घंटियां बज रही थीं और गलियों में ‘जय श्रीराम’ के नारे गूंज रहे थे। लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही घंटों में यह शहर खून की नदी में बहने वाला है।
दरअसल, दो दिन पहले यानी 22 अक्टूबर को फतेहपुर गांव में दोनों समुदायों के बीच तनाव शुरू हो गया था। नारेबाज़ी और धमकियों ने माहौल को जहरीला बना दिया। प्रशासन ने चेतावनी के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया — यही लापरवाही आगे चलकर मौत का सबब बनी।
तातारपुर से शुरू हुआ नरसंहार
24 अक्टूबर को तातारपुर इलाके में एक जुलूस निकला। कहा गया कि जुलूस पर पत्थरबाज़ी हुई और देखते ही देखते आग फैल गई। शहर के कई हिस्सों में दंगे भड़क उठे। कई गवाहों का कहना है कि यह दंगा योजनाबद्ध था — पहले से तय था कि कौन मारा जाएगा और किसे छोड़ना है।
कुछ ही घंटों में नफरत की लपटें पूरे भागलपुर जिले में फैल गईं। अल्पसंख्यक बहुल इलाकों को निशाना बनाया गया और 250 गांव जलकर राख हो गए।
लाशों से पटे खेत और जले घर
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इन दंगों में 1062 लोगों की मौत हुई, लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट ने सच्चाई उजागर की — असल में 1874 लोग मारे गए, जिनमें 97% मुस्लिम समुदाय के थे।
कई शवों को कुओं में फेंक दिया गया, तालाबों में डुबो दिया गया, और खेतों के नीचे दफना दिया गया ताकि सबूत मिट जाएं। कुछ जगहों पर उन खेतों में बाद में गोभी की फसल उगाई गई, ताकि कोई शक न कर सके।
लोगाई गांव: जहां इंसानियत दफन हुई
27 अक्टूबर 1989 को लोगाई गांव नरसंहार का केंद्र बना। वहां 116 मुसलमानों को चुन-चुनकर मारा गया और फिर उनकी लाशें खेतों में दबा दी गईं। बाद में जब जांच आयोग ने खुदाई करवाई, तो मिट्टी के नीचे से 116 कंकाल निकले।
गांव की एक महिला जमीला बीवी की कहानी आज भी लोगों को रुला देती है — जब वह अपने बच्चों को लेकर भागी, तब उनके रिश्तेदारों और पड़ोसियों को भीड़ ने जला दिया था।
पुलिस की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
दंगे के दौरान पुलिस की भूमिका पर सवाल उठे। कई चश्मदीदों ने कहा कि पुलिस मूकदर्शक ही नहीं बल्कि हमलावरों की मददगार थी। कई इलाकों में बीएसएफ और सेना को गुमराह किया गया।
जब तक सेना पहुंची, तब तक हजारों घर जल चुके थे और सैकड़ों बच्चे अनाथ हो चुके थे। उस समय बिहार में कांग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा थे। लेकिन सरकार चुप रही, जबकि जनता की चीखें आसमान तक गूंज रही थीं।
मुख्य आरोपी कामेश्वर यादव और सियासी साजिश
जांच में सामने आया कि इस दंगे का मुख्य आरोपी कामेश्वर यादव था — जिसके पास लगभग 200 गुर्गों की निजी सेना थी। कहा जाता है कि उसी ने 1200 मुसलमानों की हत्या करवाई। भीड़ उसकी जय-जयकार कर रही थी और प्रशासन मौन था।
दंगे के बाद कांग्रेस की सरकार गिर गई और बिहार में जनता दल की सरकार आई। लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने, लेकिन पीड़ितों को इंसाफ नहीं मिला। कई आरोपी नेताओं के साथ मंच साझा करते रहे, और कुछ बरी हो गए।
नीतीश सरकार में जागी उम्मीद
साल 2005 में जब नीतीश कुमार की सरकार बनी, तब जस्टिस एन.ए. सिंह आयोग गठित किया गया। जांच में कई तथ्य सामने आए और 2007 में लोगाई नरसंहार के 14 दोषियों को सज़ा हुई। कुछ पीड़ित परिवारों को मुआवजा और पेंशन दी गई।
फिर भी भागलपुर के खेत आज भी उन चीखों की गवाही देते हैं, जो 1989 में हवा में गूंज रही थीं।
इंसाफ अब भी अधूरा
तीन दशक बीत जाने के बाद भी भागलपुर दंगा भारत के इतिहास पर एक काला धब्बा बना हुआ है। कई गांव अब भी वीरान हैं, कई परिवार अब भी लौट नहीं पाए। यह घटना केवल एक दंगे की नहीं — यह इंसानियत, शासन और न्याय प्रणाली की नाकामी की कहानी है।
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