भारत में अप्रैल 2025 से लागू E20 फ्यूल (20% एथेनॉल ब्लेंड पेट्रोल) को ग्रीन एनर्जी की दिशा में बड़ा कदम बताया गया था, लेकिन अब यही फ्यूल वाहन मालिकों के लिए परेशानी का कारण बनता जा रहा है। हाल ही में आए एक सर्वे में सामने आया है कि 10 में से 8 वाहन मालिकों का माइलेज घटा है, जबकि मेंटेनेंस खर्च बढ़ गया है।
E20 पेट्रोल क्या है?
E20 एक ऐसा पेट्रोल मिश्रण है जिसमें 20 फीसदी एथेनॉल और 80 फीसदी पारंपरिक पेट्रोल होता है। एथेनॉल एक बायो-फ्यूल है, जो गन्ना, मक्का जैसी फसलों से तैयार किया जाता है। सरकार का उद्देश्य है प्रदूषण घटाना और किसानों को अतिरिक्त आय देना।
हालांकि, पुराने वाहनों के इंजन और फ्यूल सिस्टम इस मिश्रण के लिए डिज़ाइन नहीं किए गए हैं, जिसके चलते इंजन दिक्कतें, स्टार्टिंग प्रॉब्लम और माइलेज ड्रॉप जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं।
सर्वे में चौंकाने वाले खुलासे
LocalCircles द्वारा किए गए सर्वे के मुताबिक,
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2022 या उससे पहले खरीदे गए वाहनों के 80% मालिकों ने बताया कि 2025 में उनकी गाड़ियों की फ्यूल एफिशिएंसी घट गई है।
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अगस्त 2025 में यह आंकड़ा 67% था, जो अक्टूबर तक बढ़कर 80% हो गया।
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सर्वे में देशभर के 323 जिलों के 36,000 वाहन मालिकों ने हिस्सा लिया।
इनमें 69% पुरुष और 31% महिलाएं थीं। आधे प्रतिभागी टियर-1 शहरों से, जबकि बाकी छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों से थे।
माइलेज घटा, शिकायतें बढ़ीं
E20 पेट्रोल के अनिवार्य होने के बाद से वाहन माइलेज में गिरावट और इंजन परफॉर्मेंस में दिक्कतें आम हो गई हैं।
कई वाहन मालिकों ने सोशल मीडिया पर अपने अनुभव साझा किए —
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कारों का स्टार्ट न होना,
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इंजन रिपेयर पर हज़ारों रुपये खर्च होना,
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टू-व्हीलर्स में मिसफायरिंग और झटके आना।
चेन्नई के एक लक्ज़री कार मालिक ने बताया कि उनकी कार का इंजन फेल हो गया और उन्हें ₹4 लाख तक का रिपेयर खर्च उठाना पड़ा। देशभर के मेकैनिक्स के अनुसार, अप्रैल के बाद से फ्यूल से जुड़ी शिकायतें 40% तक बढ़ी हैं।
पुराने वाहनों के लिए बड़ा खतरा
LocalCircles के अनुसार, 52% वाहन मालिकों ने बताया कि उनकी गाड़ियों में वियर एंड टियर (घिसाव) बढ़ गया है और बार-बार रिपेयर की जरूरत पड़ रही है।
अगस्त में यह आंकड़ा केवल 28% था, जो अक्टूबर में लगभग दोगुना हो गया।
मेकैनिक्स का कहना है कि पुराने इंजन E20 फ्यूल को सहन नहीं कर पा रहे, जिससे इंजन, फ्यूल लाइन और सील खराब हो रही हैं।
सरकार का पक्ष
सरकार का कहना है कि E20 पहल का उद्देश्य है —
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क्लीन एनर्जी को बढ़ावा देना,
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इंपोर्टेड क्रूड ऑयल पर निर्भरता घटाना,
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और किसानों को अतिरिक्त आमदनी देना।
सरकारी दावा है कि नई गाड़ियां E20 कंपैटिबल हैं, लेकिन पुराने वाहनों के लिए धीरे-धीरे बदलाव का समय दिया गया है। हालांकि, जनता का कहना है कि यह कदम मध्यमवर्गीय वाहन मालिकों की जेब पर भारी पड़ रहा है।
दुनियाभर में एथेनॉल ब्लेंडिंग का चलन
ग्लोबल लेवल पर भी एथेनॉल ब्लेंडिंग तेजी से बढ़ रही है।
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2024 में ग्लोबल एथेनॉल मार्केट 98.5 बिलियन डॉलर का था,
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जो 2035 तक 205.2 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है।
अमेरिका और ब्राजील इस सेक्टर में अग्रणी हैं और दुनिया के लगभग 80% एथेनॉल उत्पादन में योगदान देते हैं।
कई देशों में अलग-अलग ब्लेंडिंग नीतियां हैं — जैसे E5, E10, E27, आदि।
निष्कर्ष: ग्रीन मिशन या कॉस्टली मिशन?
भारत में E20 फ्यूल को क्लीन एनर्जी के रूप में पेश किया गया था, लेकिन आम जनता का अनुभव कुछ और कहता है।
जहां सरकार इसे ‘ग्रीन मिशन’ बता रही है, वहीं वाहन मालिकों के लिए यह ‘कॉस्टली मिशन’ बनता जा रहा है।
अब सवाल यह है कि क्या यह कदम वाकई में पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ आम नागरिकों की जेब के लिए भी सही साबित होगा?
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