अहमदाबाद: गुजरात हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान 15 वर्षीय नाबालिग रेप पीड़िता ने एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया। यह घटना उस समय हुई जब अदालत 35 सप्ताह पुराने भ्रूण के गर्भपात की अनुमति देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। कोर्ट ने अब इस याचिका को “निरर्थक” घोषित करते हुए राज्य सरकार को प्रसव और छह महीने तक के खर्च उठाने का आदेश दिया है।
सुनवाई के बीच हुआ प्रसव, कोर्ट ने दी तत्काल सहायता के निर्देश
न्यायमूर्ति समीर दवे की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत को जानकारी दी गई कि नाबालिग को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई है। उसे तुरंत अहमदाबाद के सोला सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसने 28 अक्टूबर को दोपहर 2.2 किलोग्राम की बच्ची को जन्म दिया।
अदालत ने कहा कि गर्भपात से जुड़ी याचिका अब लागू नहीं रही क्योंकि बच्चा जन्म ले चुका है। कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि पीड़िता और नवजात की देखभाल, चिकित्सा और पुनर्वास की पूरी जिम्मेदारी ली जाए।
सरकार उठाएगी छह महीने तक का खर्च
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि राज्य सरकार नाबालिग और नवजात के प्रसव, चिकित्सा और पोषण से जुड़े सभी खर्चों का वहन करेगी। साथ ही, दोनों की नियमित स्वास्थ्य जांच कराई जाएगी ताकि किसी तरह की लापरवाही न हो।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर नाबालिग चाहती है कि बच्ची को दत्तक (गोद) दिया जाए, तो यह प्रक्रिया अहमदाबाद की किसी मान्यता प्राप्त एजेंसी के माध्यम से कानूनी रूप से पूरी की जाए।
बाल कल्याण समिति को निगरानी की जिम्मेदारी
कोर्ट ने बाल कल्याण समिति (Child Welfare Committee) को पूरे मामले की निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी है। समिति यह सुनिश्चित करेगी कि नाबालिग और नवजात दोनों को सुरक्षित वातावरण, मानसिक सहयोग और आवश्यक सहायता मिलती रहे।
अगर नाबालिग अपने परिवार के साथ नहीं रहना चाहती, तो उसे किसी महिला आश्रय गृह में रखा जाएगा, जहां उसकी शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण की भी व्यवस्था होगी ताकि वह आत्मनिर्भर बन सके।
अदालत ने पुनर्वास और मानसिक सहायता पर दिया जोर
गुजरात हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि नाबालिग को केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक सहायता भी दी जानी चाहिए ताकि वह सामान्य जीवन की ओर लौट सके।
इसके लिए कोर्ट ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को निर्देश दिया है कि वह बच्ची के लिए अंतरिम मुआवजा तय करे और पूरी पुनर्वास प्रक्रिया की निगरानी करे। अदालत ने यह भी कहा कि सभी संबंधित विभाग मिलकर सुनिश्चित करें कि नाबालिग को किसी प्रकार की सामाजिक उपेक्षा या भेदभाव का सामना न करना पड़े।
मेडिकल रिपोर्ट ने उजागर की स्थिति
अदालत में पेश की गई सोला सिविल अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, गर्भ की अवधि 35 सप्ताह और 3 दिन थी। नाबालिग को 25 अक्टूबर को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों ने बताया कि बच्ची का वजन 2.2 किलोग्राम है और वह पूरी तरह स्वस्थ है। वर्तमान में मां और बच्ची दोनों की हालत स्थिर है।
समाज और प्रशासन के लिए संदेश
इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि नाबालिगों के खिलाफ बढ़ते यौन अपराधों पर नियंत्रण कैसे किया जाए। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि ऐसे मामलों में सरकार को न केवल अपराधियों पर कठोर कार्रवाई करनी चाहिए, बल्कि पीड़िताओं के पुनर्वास और सामाजिक सुरक्षा पर भी ध्यान देना जरूरी है।
निष्कर्ष
गुजरात हाईकोर्ट का यह फैसला नाबालिग पीड़िताओं की सुरक्षा, पुनर्वास और गरिमा सुनिश्चित करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। अदालत के आदेश से यह स्पष्ट संदेश गया है कि न्याय केवल सजा तक सीमित नहीं, बल्कि संवेदनशील देखभाल और पुनर्वास भी उसका हिस्सा है।
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