मुजफ्फरपुर में पीएम मोदी का गमछा लहराने वाला वीडियो वायरल, बिहार की सियासत में बढ़ी चर्चा – किसानों और मजदूरों को भेजा बड़ा संदेश

बिहार के मैदान में गूंजा ‘मोदी-मोदी’

बिहार के मैदान में गूंजा ‘मोदी-मोदी’, वायरल हुआ गमछा वाला वीडियो

मुजफ्फरपुर (बिहार): बिहार की सियासत इस वक्त एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक छोटे से इशारे से गर्मा गई है। सोशल मीडिया पर पीएम मोदी का गमछा लहराते हुए वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है।
भीषण गर्मी और उमस के बीच प्रधानमंत्री जब मंच पर पहुंचे, तो उन्होंने मधुबनी प्रिंट वाले पारंपरिक गमछे से भीड़ का अभिवादन किया।
मंच के सामने मौजूद हजारों समर्थक ‘मोदी-मोदी’ के नारों से मैदान गुंजा उठे।

यह वीडियो करीब 30 सेकंड का है, जिसमें प्रधानमंत्री मुस्कुराते हुए समर्थकों की ओर हाथ हिलाते नजर आ रहे हैं। उन्होंने कुछ देर तक गमछा लहराया और फिर अपने अगले कार्यक्रम के लिए छपरा रवाना हो गए।


 वायरल वीडियो बना सियासी चर्चा का विषय

यह कोई पहली बार नहीं है जब प्रधानमंत्री मोदी को बिहार में इस अंदाज में देखा गया हो।
इससे पहले भी अगस्त 2025 में जब उन्होंने औंटा-सिमरिया पुल का उद्घाटन किया था, तब भी वे इसी तरह मधुबनी प्रिंट वाले गमछे में नजर आए थे।

प्रधानमंत्री मोदी कई मौकों पर स्थानीय परिधानों और प्रतीकों के जरिए जनता से जुड़ाव दिखाते रहे हैं — चाहे वह स्वतंत्रता दिवस पर अलग-अलग राज्यों की पारंपरिक पगड़ी पहनना हो या क्षेत्रीय वस्त्रों के ज़रिए सांस्कृतिक सम्मान जताना।


 गमछे के पीछे का राजनीतिक संदेश

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, बिहार जैसे राज्य में ‘गमछा’ सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि जनसंस्कृति का प्रतीक है।
यह किसानों, मजदूरों और आम जनता की मेहनत और सादगी का प्रतीक माना जाता है।

बिहार और बंगाल जैसे राज्यों में गमछा खेतों में काम करने, धूप से बचने और रोजमर्रा के कामों में इस्तेमाल किया जाता है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पीएम मोदी का यह कदम महज एक इशारा नहीं, बल्कि एक सोचा-समझा प्रतीकात्मक संदेश है — कि वे खुद को मेहनतकश वर्ग और ग्रामीण समाज के करीब दिखाना चाहते हैं।


 किसानों और मजदूर वर्ग को साधने की कोशिश

बिहार में कृषि और मजदूरी करने वाली आबादी चुनावी समीकरणों में अहम भूमिका निभाती है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राज्य की लगभग 53.2% आबादी कृषि क्षेत्र से जुड़ी है।
इसके अलावा बड़ी संख्या में भूमिहीन मजदूर और प्रवासी कामगार हैं, जिनकी भूमिका हर चुनाव में निर्णायक रहती है।

राजनीतिक पंडितों का कहना है कि पीएम मोदी का यह भावनात्मक जुड़ाव वाला संदेश सीधे ग्रामीण वोट बैंक को प्रभावित कर सकता है।
गमछा लहराना एक सांस्कृतिक और भावनात्मक प्रतीक है, जो बिहार के लोगों को यह एहसास कराता है कि प्रधानमंत्री उनके जीवन और संघर्ष से परिचित हैं।


 सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रिया

जैसे ही यह वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया, लोगों ने इसे ‘पीएम मोदी का आमजन से जुड़ाव’ बताया।
कई यूजर्स ने ट्विटर (अब X) और फेसबुक पर लिखा —

“यही हैं हमारे प्रधानमंत्री, जो हर राज्य की संस्कृति को दिल से अपनाते हैं।”
“गमछा बिहार की पहचान है, और पीएम मोदी ने इसे सम्मान दिया।”

वहीं विपक्षी दलों ने इसे राजनीतिक स्टंट बताते हुए कहा कि यह सिर्फ चुनावी मंच पर भावनाएं भुनाने की कोशिश है।


 निष्कर्ष

मुजफ्फरपुर में पीएम मोदी का गमछा लहराने वाला वीडियो न सिर्फ सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है, बल्कि इसने बिहार की सियासत में भी नई बहस छेड़ दी है।
एक ओर जहां भाजपा समर्थक इसे संस्कृति से जुड़ाव का प्रतीक बता रहे हैं, वहीं विपक्ष इसे चुनावी रणनीति का हिस्सा मान रहा है।

चाहे जो भी हो, एक बात तो तय है — बिहार के सियासी रण में अब गमछा भी राजनीति का अहम प्रतीक बन चुका है।

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