पश्चिम एशिया में इजरायल और इरान के बीच बढ़ते संघर्ष का असर अब भारत के बंदरगाहों और एक्सपोर्ट सेक्टर पर भी महसूस किया जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, गल्फ देशों को भेजी जा रही लगभग 2,000 हुंडई कारें अब वापस चेन्नई पोर्ट लाने की संभावना है।
हालांकि युद्ध हिंदुस्तान से हजारों किलोमीटर दूर हो रहा है, लेकिन इसके कारण समुद्री रूट और एक्सपोर्ट शेड्यूल प्रभावित हो रहे हैं। इसका सबसे ज्यादा असर ऑटोमोबाइल और टेक्सटाइल एक्सपोर्ट पर दिखाई दे रहा है।
समुद्री रूट में बदलाव और कंटेनर ट्रैफिक प्रभावित
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण समुद्री जहाजों के मेन रूट्स जैसे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लाल सागर में जोखिम बढ़ गया है। कई शिपिंग कंपनियां इन रास्तों से अपने जहाजों को गुजरने से फिलहाल रोक रही हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि गल्फ देशों से जुड़े कंटेनर ट्रैफिक पर भी संकट का असर पड़ा है। लगभग 4,000 कंटेनरों को उनके तय रूट्स से वापस मोड़ दिया गया है, जिसमें से करीब 1,800 कंटेनर चेन्नई से रवाना किए गए थे।
तमिलनाडु के पोर्ट्स पर असर
फरवरी के आखिर में युद्ध की स्थिति तेज होने के बाद तमिलनाडु के बंदरगाहों से जहाजों की आवाजाही धीमी पड़ गई है।
विशेष रूप से वी.ओ. चिदंबरम पोर्ट (VO Chidambaranar Port) पर असर देखा जा रहा है। यह पोर्ट गल्फ देशों के लिए कंटेनर एक्सपोर्ट का प्रमुख केंद्र माना जाता है।
आमतौर पर इस पोर्ट से कपड़े, होम टेक्सटाइल, फूड प्रोडक्ट्स, अंडे और इंजीनियरिंग कास्टिंग जैसे सामान सीधे गल्फ देशों को भेजे जाते हैं। लेकिन मौजूदा हालात के कारण कई शिपमेंट देर या रूट बदलने की समस्या का सामना कर रहे हैं।
उदाहरण के तौर पर, 28 फरवरी को झोंग गु ताई युआन (Zhong Gu Tai Yuan) कार्गो शिप 250 कंटेनरों के साथ थूथुकुडी पोर्ट से रवाना हुआ, लेकिन बीच में समुद्री रास्ते बदलने के कारण कार्गो को अंततः जवाहरलाल नेहरू पोर्ट पर उतारना पड़ा।
चेन्नई पोर्ट की तैयारी और वैकल्पिक रूट्स
चेन्नई पोर्ट अथॉरिटी इस समस्या से निपटने के लिए कई कदम उठा रही है। चिदंबरम पोर्ट के टर्मिनल के बाहर लगभग 20,000 वर्ग मीटर यार्ड को अस्थायी कार्गो स्टोरेज के रूप में इस्तेमाल करने पर विचार किया जा रहा है।
इसके अलावा पोर्ट अथॉरिटी और एक्सपोर्टर्स के बीच हाई-लेवल मीटिंग का दौर जारी है। इसका मकसद है जहाजों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से बचाने और वैकल्पिक समुद्री रास्तों पर विचार करना।
भारत की एक्सपोर्ट सेक्टर पर जंग का असर
पश्चिम एशिया में जंग का असर सीधे भारत के ऑटोमोबाइल और टेक्सटाइल इंडस्ट्री पर पड़ रहा है।
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हुंडई की लगभग 2,000 कारें गल्फ देशों के लिए भेजी गई थीं, लेकिन युद्ध के कारण उन्हें वापस लाना पड़ सकता है।
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कंटेनर शिपमेंट रूट बदलने के कारण समय और लागत दोनों बढ़ रही हैं।
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लंबे समय तक संघर्ष जारी रहने पर भारतीय एक्सपोर्ट सेक्टर की स्थिरता पर असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक सुरक्षा संकट भारत जैसे एक्सपोर्ट-डिपेंडेंट देशों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
निष्कर्ष
हालांकि जंग भारत से दूर हो रही है, लेकिन इसके समुद्री रूट और बंदरगाहों पर प्रभाव से घरेलू कारोबार और एक्सपोर्ट सेक्टर प्रभावित हो रहा है।
चेन्नई पोर्ट और अन्य बंदरगाह अधिकारियों द्वारा वैकल्पिक योजना और अस्थायी स्टोरेज के विकल्पों पर काम जारी है। इसका मकसद है समुद्री शिपमेंट को सुरक्षित बनाए रखना और व्यापार प्रभावित न होने पाए।
यह स्थिति दर्शाती है कि वैश्विक संघर्ष का असर सिर्फ युद्धक्षेत्र तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि भारत के व्यवसाय और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है।

