UGC New Rules Protest: नए नियमों के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन, 5 पॉइंट्स में समझें विरोध की असली वजह

नए नियमों के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन

UGC के नए नियमों से क्यों मचा बवाल?

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 13 जनवरी 2026 को उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए नए नियम लागू किए हैं, जिनका नाम है
“Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026”
इन नियमों का उद्देश्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव और असमानता को रोकना बताया गया है।

लेकिन नियम लागू होते ही दिल्ली, लखनऊ समेत कई शहरों में छात्र, शिक्षक और प्रोफेसर सड़कों पर उतर आए। सवाल यह है कि अगर मकसद समानता है, तो फिर विरोध क्यों?


UGC क्या कहता है?

UGC के मुताबिक:

  • SC, ST और OBC छात्रों से जुड़ी भेदभाव की शिकायतों में 2020–2025 के बीच 100% से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है।

  • रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद सख्त नियम जरूरी हो गए थे।

  • 2012 के पुराने नियम केवल सलाहात्मक थे, जबकि 2026 के नियम अनिवार्य हैं।

नए नियमों के तहत हर संस्थान में:

  • इक्विटी कमेटी

  • इक्विटी स्क्वॉड

  • इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर

  • 24×7 हेल्पलाइन
    बनाना जरूरी होगा। नियम न मानने पर UGC मान्यता या फंड रोक सकता है।


अब समझिए विरोध की वजह – 5 पॉइंट्स में

1. जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा पर आपत्ति

विरोध करने वालों का कहना है कि नियमों में जाति आधारित भेदभाव को मुख्य रूप से SC, ST और OBC तक सीमित कर दिया गया है।
आलोचकों के अनुसार इससे जनरल कैटेगरी के छात्र और शिक्षक, अगर भेदभाव का शिकार हों, तो उन्हें समान सुरक्षा नहीं मिल पाएगी।


2. रेगुलेशन 3(c) को लेकर विवाद

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में कहा गया है कि रेगुलेशन 3(c) के तहत जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा बहुत सीमित है।
इससे गैर-आरक्षित वर्ग के लोगों को संस्थागत शिकायत तंत्र से बाहर किया जा सकता है।


3. इक्विटी कमेटी में प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल

नियमों के अनुसार इक्विटी कमेटी में SC, ST, OBC, दिव्यांग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है।
विरोधियों का कहना है कि इसमें जनरल कैटेगरी के प्रतिनिधित्व का स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जिससे निर्णय एकतरफा हो सकते हैं।


4. झूठी शिकायतों से निपटने का कोई साफ नियम नहीं

प्रदर्शनकारियों की बड़ी चिंता यह भी है कि नियमों में फर्जी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों से निपटने के लिए कोई स्पष्ट प्रक्रिया तय नहीं की गई है।
इससे शिक्षकों और प्रशासन पर दबाव या दुरुपयोग की आशंका जताई जा रही है।


5. संस्थानों पर सख्त कार्रवाई का डर

नियम न मानने पर UGC को मान्यता रद्द करने या फंड रोकने का अधिकार दिया गया है।
कई शिक्षाविदों का कहना है कि इससे संस्थानों पर जरूरत से ज्यादा प्रशासनिक दबाव पड़ेगा।


सरकार का रुख क्या है?

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि सरकार किसी के साथ अन्याय नहीं होने देगी।
हालांकि प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह बयान उनकी चिंताओं को सीधे तौर पर संबोधित नहीं करता।


निष्कर्ष

UGC के नए नियमों का मकसद समानता और भेदभाव मुक्त कैंपस बनाना है, लेकिन नियमों की भाषा, परिभाषाओं और संरचना को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
यही वजह है कि छात्र और शिक्षक इन नियमों में संशोधन और स्पष्टता की मांग कर रहे हैं।

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