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इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: पहली शादी खत्म न हो तो लिव-इन पार्टनर से नहीं मिल सकता भरण-पोषण

पहली शादी खत्म न हो तो लिव-इन पार्टनर से नहीं मिल सकता भरण-पोषण

प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप और भरण-पोषण से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी महिला की पहली शादी कानूनी रूप से समाप्त नहीं हुई है, तो वह लिव-इन पार्टनर से धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक साथ रहने या समाज में पति-पत्नी की तरह पहचाने जाने से महिला को कानूनी पत्नी का दर्जा नहीं मिल जाता।


क्या है पूरा मामला?

यह मामला एक ऐसी महिला से जुड़ा है, जिसका अपने पहले पति से तलाक का केस चल रहा था। इसी दौरान वह करीब 10 वर्षों तक एक अन्य व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रही। महिला ने दावा किया कि उसे समाज में उस व्यक्ति की पत्नी के रूप में स्वीकार किया गया और उसके नाम कई सरकारी दस्तावेजों में भी दर्ज थे।

बाद में महिला ने आरोप लगाया कि लिव-इन पार्टनर और उसके बेटों ने उसके साथ क्रूरता की, उत्पीड़न किया और मार्च 2018 में उसे घर से बाहर निकाल दिया। इसके बाद महिला ने धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण की मांग की।


जिला अदालत और हाई कोर्ट का फैसला

जिला अदालत ने महिला की भरण-पोषण याचिका खारिज कर दी थी। इसके खिलाफ महिला ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की, लेकिन वहां भी उसे राहत नहीं मिली।

जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ ने कहा कि महिला की पहली शादी अभी भी कानूनी रूप से कायम है। ऐसे में यदि दूसरी शादी मानी भी जाए, तो वह कानूनन अवैध होगी। इसलिए महिला को धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण का अधिकार नहीं मिल सकता।


कोर्ट ने क्या कहा?

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा,

“यदि समाज में यह स्वीकार कर लिया जाए कि कोई महिला पहली शादी कायम रहते हुए दूसरे व्यक्ति के साथ रह सकती है और बाद में उससे भरण-पोषण मांग सकती है, तो इससे धारा 125 CrPC का मूल उद्देश्य और विवाह संस्था की कानूनी व सामाजिक गरिमा कमजोर हो जाएगी।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबे समय तक साथ रहना या विवाह जैसा संबंध दिखना, कानूनी पत्नी होने का प्रमाण नहीं है।


महिला की दलील क्यों नहीं मानी गई?

महिला के वकील ने दलील दी थी कि उसका नाम लिव-इन पार्टनर की पत्नी के रूप में आधार कार्ड, पासपोर्ट जैसे दस्तावेजों में दर्ज है और समाज में भी उसे पत्नी के रूप में स्वीकार किया गया है।
हालांकि कोर्ट ने कहा कि केवल दस्तावेजों या सामाजिक मान्यता के आधार पर पत्नी का कानूनी दर्जा नहीं दिया जा सकता, खासकर तब जब पहली शादी समाप्त न हुई हो।


धारा 125 CrPC पर कोर्ट की स्पष्ट राय

8 दिसंबर को दिए गए अपने फैसले में हाई कोर्ट ने कहा कि धारा 125 CrPC का उद्देश्य उन महिलाओं को संरक्षण देना है, जो कानूनी रूप से विवाहित हैं और जिन्हें पति ने बेसहारा छोड़ दिया है। यह प्रावधान ऐसे मामलों पर लागू नहीं होता, जहां महिला पहले से विवाहित हो और दूसरी जगह लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही हो।


क्यों है यह फैसला अहम?

यह फैसला लिव-इन रिलेशनशिप, विवाह और भरण-पोषण कानूनों को लेकर एक स्पष्ट दिशा देता है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि जब तक पहली शादी कानूनी रूप से खत्म न हो, तब तक महिला को दूसरे रिश्ते के आधार पर भरण-पोषण का अधिकार नहीं मिल सकता।

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