किशोरों की मासूमियत पर हमला कर रहे आधुनिक माध्यम
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है, जिसमें उसने किशोरों पर टेलीविजन, इंटरनेट और सोशल मीडिया के “विनाशकारी” प्रभावों पर गहरी चिंता जताई। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि ये माध्यम किशोरों के संवेदनशील मस्तिष्क पर हानिकारक असर डाल रहे हैं, जिसके कारण उनकी मासूमियत बहुत कम उम्र में समाप्त हो रही है। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी बॉम्बे हाई कोर्ट के एक फैसले से सहमति व्यक्त करते हुए दी, जिसमें 2019 में मुमताज अहमद नासिर खान बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में किशोरों पर इन माध्यमों के प्रभाव को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की गई थी।
कोर्ट की चिंता: किशोरों पर प्रभाव और सरकार की चुप्पी
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि टेलीविजन, इंटरनेट और सोशल मीडिया जैसे दृश्य माध्यम किशोरों के मस्तिष्क को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं, लेकिन इन्हें नियंत्रित करने में सरकार की नाकामी दिखाई देती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इन तकनीकी माध्यमों की अनियंत्रित प्रकृति के कारण उनकी नकारात्मकता को रोकना संभव नहीं हो पा रहा है। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब किशोरों में ऑनलाइन सामग्री के माध्यम से गलत दिशा में जाने की घटनाएं बढ़ रही हैं।
मामला और पुनरीक्षण याचिका
यह मामला एक किशोर द्वारा दायर की गई आपराधिक पुनरीक्षण याचिका से जुड़ा था। किशोर ने आरोप लगाया था कि उसे नाबालिग लड़की के साथ सहमति से शारीरिक संबंध बनाने के आरोप में वयस्क के रूप में मुकदमा चलाने का आदेश दिया गया था। किशोर ने निचली अदालतों के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे वयस्क माना गया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस याचिका पर विचार करते हुए कई महत्वपूर्ण बातें उठाई और किशोर न्याय बोर्ड के निर्णय को बरकरार रखा।
मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन रिपोर्ट और किशोर का मानसिक स्तर
कोर्ट ने किशोर का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन रिपोर्ट पर भी ध्यान दिया। रिपोर्ट के अनुसार, किशोर का आईक्यू 66 था, जो कि बौद्धिक कार्यशीलता की “सीमांत” श्रेणी में आता है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया था कि किशोर की मानसिक आयु केवल छह वर्ष आंकी गई थी, जो उसकी मानसिक स्थिति को दर्शाता है।
निर्भया मामला और किशोर न्याय
न्यायालय ने कहा कि सिर्फ जघन्य अपराध करने से किसी किशोर को वयस्क के रूप में मुकदमा चलाने का अधिकार नहीं मिलता। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ ने यह भी कहा कि निर्भया मामले को अपवाद मानते हुए, सभी किशोरों पर वयस्कों की तरह मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, जब तक उनके मानसिक और सामाजिक प्रभावों का सही तरीके से आकलन न किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले में मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट किशोर के पक्ष में थी और उसे उचित नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बॉम्बे हाई कोर्ट की टिप्पणियों पर सहमति
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के 2019 के फैसले पर सहमति जताई, जिसमें यह कहा गया था कि टेलीविजन, इंटरनेट और सोशल मीडिया किशोरों के मस्तिष्क पर हानिकारक प्रभाव डाल रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि इन माध्यमों के प्रभाव को नियंत्रित करने में सरकार की नाकामी दिखाई देती है, और इन तकनीकी प्रौद्योगिकियों की अनियंत्रित प्रकृति के कारण यह समस्या बढ़ रही है।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाई कोर्ट की यह टिप्पणी एक गंभीर सवाल उठाती है कि किशोरों पर बढ़ते हुए डिजिटल प्रभावों को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है। सरकार और समाज दोनों को मिलकर इस मुद्दे पर ध्यान देना चाहिए ताकि किशोरों की मानसिक और सामाजिक स्थिति को बेहतर तरीके से समझा जा सके और उनकी मासूमियत की रक्षा की जा सके।

