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गुजरात में अंधविश्वास की हद! बीमार बेटे के लिए 15 बकरों की बलि की तैयारी, पुलिस और ट्रस्ट ने रोका खेल

गुजरात में अंधविश्वास की हद!

गुजरात के राजकोट में अंधविश्वास का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पूरे शहर को हैरान कर दिया। बीमार बेटे के इलाज के नाम पर एक परिवार ने 15 बकरों की बलि देने की तैयारी कर ली थी। लेकिन जीवदया ट्रस्ट और पुलिस की समय रहते कार्रवाई से इस अमानवीय कृत्य को रोक दिया गया। पुलिस ने मौके से 9 बकरों को बचाया, जबकि 6 की पहले ही बलि दी जा चुकी थी।


अंधविश्वास के चलते ‘मन्नत’ के नाम पर बलि की थी तैयारी

सूत्रों के मुताबिक, राजकोट के ग्रीनलैंड चौकड़ी के पास रहने वाले चौहान परिवार का बेटा लंबे समय से बीमार चल रहा था। इलाज के बजाय परिवार ने तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास का सहारा लिया। परिवार का मानना था कि माता की पूजा करने और 15 जीवों की बलि चढ़ाने से बच्चा ठीक हो जाएगा।

इसी मन्नत को पूरा करने के लिए परिवार ने छिपकर बकरों की बलि की योजना बनाई।


जीवदया ट्रस्ट को मिली सूचना, पुलिस के साथ की छापेमारी

घटना की भनक लगते ही जीवदया ट्रस्ट के कार्यकर्ताओं को सूचित किया गया। ट्रस्ट ने तुरंत थोराला पुलिस को जानकारी दी और टीम के साथ मौके पर पहुँचे। छापेमारी के दौरान 9 बकरे जीवित मिले, जिन्हें तुरंत कब्ज़े में ले लिया गया।

लेकिन तब तक 6 बकरों की बलि दी जा चुकी थी, जिसके चलते ट्रस्ट और पुलिस अधिकारियों ने कड़ी नाराजगी जताई।


पुलिस ने तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया

एसीपी भावेश जाधव ने बताया कि ग्रीनलैंड चौकड़ी के पास पशुबलि की सूचना मिलने के बाद पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की। मौके से तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है।

पुलिस ने इनके खिलाफ पशु संरक्षण अधिनियम, पशु क्रूरता निषेध कानून सहित कई धाराओं में मामला दर्ज किया है।


बीच शहर में अंधविश्वास ने चौकाया

राजकोट जैसे विकसित शहर में इस तरह की घटना होना चिंताजनक है। 21वीं सदी में भी अंधविश्वास के नाम पर जानवरों की बलि चढ़ाने की कोशिश ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

स्थानीय लोगों ने भी इस घटना पर गुस्सा जताते हुए कहा कि—

“इलाज के नाम पर बलि देना न कानूनन सही है, न मानवीय।”


ट्रस्ट की एक्टिव भूमिका से बचाई गई 9 जानें

जीवदया ट्रस्ट के सदस्यों ने बताया कि सूचना मिलते ही वे मौके पर पहुँचे।
उनके अनुसार—

“अगर देर हो जाती, तो बाकी 9 बकरे भी मार दिए जाते। समय रहते पुलिस पहुंच गई और 9 जीवों की जान बच गई।”

ट्रस्ट की त्वरित कार्रवाई की पूरे शहर में सराहना की जा रही है।


परिवार की आस्था बनी अमानवीयता का कारण

चौहान परिवार का मानना था कि शक्ति की पूजा में पशुबलि देने से उनका बेटा ठीक हो जाएगा। इसी भ्रम और अंधविश्वास के कारण वे इतने बड़े अपराध को अंजाम देने जा रहे थे।

विशेषज्ञों का कहना है कि—

“बीमारी का उपचार विज्ञान से होता है, लेकिन अंधविश्वास कई बार लोगों को अपराध की राह पर ले जाता है।”


समाज में जागरूकता की जरूरत

यह घटना सिर्फ एक परिवार की सोच नहीं, बल्कि समाज में मौजूद उस अंधविश्वास का प्रतीक है, जो आज भी कई जगह लोगों की मानसिकता पर हावी है।

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि ऐसी घटनाओं पर रोक लगाने के लिए जागरूकता जरूरी है।
पशु संरक्षण संगठनों ने भी मांग की है कि पशु क्रूरता के ऐसे मामलों में कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।


निष्कर्ष

राजकोट की यह घटना बताती है कि आधुनिक युग में भी अंधविश्वास कितनी गहरी जड़ें जमाए हुए है। महज ‘मन्नत’ के नाम पर 15 जीवों की बलि चढ़ाने का प्रयास मानवता के खिलाफ है।
जीवदया ट्रस्ट और पुलिस की त्वरित कार्रवाई ने 9 बकरों की जान बचा ली, लेकिन यह घटना समाज को जागरूक होने का संदेश देती है।

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