दिल्ली में बिना बारिश के खर्च हुए ₹37.93 लाख, क्लाउड सीडिंग प्रयोग पर RTI से बड़ा खुलासा

दिल्ली में बिना बारिश के खर्च हुए ₹37.93 लाख

दिल्ली की हवा सुधारने का दावा, लेकिन नतीजा शून्य

दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण से निपटने के लिए अक्टूबर 2025 में कृत्रिम बारिश यानी क्लाउड सीडिंग का प्रयोग किया गया था। अब इस प्रयोग को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। एक RTI के जरिए सामने आया है कि इस योजना पर ₹37.93 लाख खर्च किए गए, जबकि ज़मीनी हकीकत यह है कि दिल्ली में कोई प्रभावी बारिश ही नहीं हुई।

बिना टेंडर IIT कानपुर को मिला प्रोजेक्ट

RTI से यह भी पता चला है कि दिल्ली सरकार ने यह प्रोजेक्ट IIT कानपुर को नॉमिनेशन बेसिस पर सौंपा। यानी इसके लिए कोई खुली टेंडर प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। सरकार का कहना है कि यह ठेका GFR रूल 194 के तहत कैबिनेट की मंजूरी से दिया गया था।
हालांकि, यह साफ नहीं किया गया कि यह फैसला किन शर्तों पर लिया गया और इसके लिए किन विकल्पों पर विचार हुआ।

खर्च का पूरा हिसाब देने से इनकार

RTI में पूछे गए सवालों के जवाब में सरकार और IIT कानपुर दोनों ने खर्च का विस्तृत ब्रेकअप देने से इनकार कर दिया।

  • विमान किराया

  • रसायनों (सिल्वर आयोडाइड/नमक) का खर्च

  • तकनीकी टीम और मानवबल

  • अन्य लॉजिस्टिक खर्च

इन सभी जानकारियों को कमर्शियल गोपनीयता का हवाला देकर सार्वजनिक नहीं किया गया। यहां तक कि इनवॉइस, बिल, वर्क ऑर्डर और MOU जैसे दस्तावेज भी साझा नहीं किए गए।

क्या है क्लाउड सीडिंग?

क्लाउड सीडिंग एक वैज्ञानिक तकनीक है, जिसमें बादलों में विशेष रसायन छिड़ककर बारिश कराने की कोशिश की जाती है। इससे हवा में मौजूद धूल और प्रदूषक कण नीचे बैठ जाते हैं। दिल्ली में इसका उद्देश्य प्रदूषण को अस्थायी रूप से कम करना था।

क्यों असफल रहा प्रयोग?

IIT कानपुर के अनुसार, 28 अक्टूबर 2025 को दो बार क्लाउड सीडिंग की कोशिश की गई। इसके लिए छोटे विमान (सेस्ना/टेक्सट्रॉन) का इस्तेमाल हुआ।
लेकिन उस दिन बादलों में नमी सिर्फ 15–20% थी, जबकि सफल क्लाउड सीडिंग के लिए कम से कम 50% नमी जरूरी होती है। इसी वजह से दिल्ली में कोई खास बारिश नहीं हुई।

नतीजों पर भी सस्पेंस

सबसे अहम सवाल यह है कि इस प्रयोग का वैज्ञानिक मूल्यांकन क्या रहा?

  • दिल्ली सरकार का कहना है कि IIT कानपुर से रिपोर्ट अभी आनी है।

  • IIT कानपुर ने भी अब तक कोई सार्वजनिक डेटा या निष्कर्ष जारी नहीं किया।

कुछ रिपोर्ट्स में प्रदूषण में 6–10% कमी का दावा किया गया, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह मौसम में बदलाव का असर हो सकता है, न कि क्लाउड सीडिंग का।

गोपनीयता पर उठे सवाल

सरकार और IIT ने RTI एक्ट की धारा 8(1)(a), (d), (e) और (i) का हवाला देकर जानकारी देने से मना किया। ये धाराएं आर्थिक हित, कमर्शियल गोपनीयता और कैबिनेट दस्तावेजों से जुड़ी हैं।
लेकिन सवाल यह है कि जब सार्वजनिक धन खर्च हुआ, तो जनता को पूरी जानकारी क्यों नहीं दी जा रही?

निष्कर्ष

दिल्ली में प्रदूषण हर साल गंभीर स्वास्थ्य संकट बनता जा रहा है। नई तकनीकों का प्रयोग जरूरी है, लेकिन पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही अहम है।
₹37.93 लाख खर्च होने के बावजूद न बारिश हुई, न ठोस रिपोर्ट सामने आई। ऐसे में यह सवाल लाजमी है—जनता के पैसे का हिसाब कौन देगा?

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