दो साल की बेटी योजिता ठाकरे की दर्दनाक मौत: इलाज में हुई लापरवाही से परिवार की जिंदगी पलट गई

"पापा घर ले चलो..."

छिंदवाड़ा की दो साल की बच्ची, योजिता ठाकरे, का इलाज के दौरान दर्दनाक निधन हो गया। 22 दिनों तक अस्पताल में संघर्ष करने के बाद योजिता को बचाया नहीं जा सका। उसके पिता, सुशांत ठाकरे, ने अपनी बेटी के इलाज में लगभग 13 लाख रुपये खर्च किए, लेकिन अंत में वह अपनी बेटी को नहीं बचा सके।

योजिता का इलाज: एक संघर्षपूर्ण यात्रा

8 सितंबर को योजिता को अचानक तेज बुखार आया, और उसके बाद से उसकी तबियत बिगड़ती चली गई। सुशांत ने बेटी को एक स्थानीय डॉक्टर के पास ले जाया, लेकिन स्थिति बिगड़ने पर उसे नागपुर के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां डॉक्टरों ने कहा कि बच्ची की किडनी में इंफेक्शन है और उसे डायलिसिस की जरूरत है।

अस्पताल में 22 दिन का दर्दनाक संघर्ष

नेल्सन हॉस्पिटल में योजिता का इलाज 22 दिनों तक चला। इन 22 दिनों में उसे 16 बार डायलिसिस पर रखा गया। हर दिन अस्पताल का बिल बढ़ता गया और परिवार की उम्मीदें टूटती गईं। सुशांत ने हर संभव प्रयास किया, जिसमें भाई ने एफडी तोड़ी, रिश्तेदारों और दोस्तों से मदद ली, और सोशल मीडिया पर क्राउडफंडिंग भी की। हालांकि, इन सबके बावजूद, बेटी की हालत बिगड़ती गई।

13 लाख का बिल: एक पिता की पीड़ा

इन्हीं 22 दिनों में अस्पताल का बिल 13 लाख रुपये से ऊपर चला गया। सुशांत, जो एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाते हैं, के लिए यह राशि जुटाना मुश्किल था, लेकिन वह अपनी बेटी की जान बचाने के लिए हर संभव कदम उठाने को तैयार थे। मगर, दुख की बात यह है कि उपचार के बावजूद 4 अक्टूबर को योजिता की किडनी पूरी तरह से फेल हो गई, और उसे बचाया नहीं जा सका।

‘पापा घर ले चलो’: आखिरी शब्द

योजिता का अंतिम संवाद सुशांत के दिल में हमेशा के लिए गूंजता रहेगा। जब उसकी तबियत खराब हो रही थी, तो उसने कमजोर, थकी हुई आवाज में कहा, “पापा घर ले चलो…” यह शब्द सुशांत के लिए सबसे दर्दनाक थे क्योंकि वह यह नहीं जानते थे कि उनकी बेटी का यह आखिरी संवाद होगा।

प्रशासन द्वारा मुआवजा

अब प्रशासन ने योजिता के परिवार को 4 लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा की है। हालांकि, सुशांत का कहना है कि पैसों से उनकी बेटी की जान की कीमत नहीं लगाई जा सकती। उनका कहना है, “मैं चाहता हूं कि इस मामले की गहरी जांच हो। अगर डॉक्टरों ने सही समय पर गंभीरता दिखाई होती, तो शायद मेरी बेटी आज जिंदा होती।”

क्या लापरवाही हुई?

यह सवाल उठता है कि क्या योजिता के इलाज में किसी तरह की लापरवाही हुई थी? क्या सही समय पर उसे आवश्यक इलाज मिल पाया था? अगर सही अस्पताल में सही समय पर इलाज किया गया होता, तो क्या योजिता को बचाया जा सकता था? ये सवाल अब भी परिवार और समाज के सामने हैं।

निष्कर्ष: सिस्टम के खिलाफ आवाज

योजिता ठाकरे की दर्दनाक कहानी हमें एक बार फिर यह सिखाती है कि स्वास्थ्य सेवा के मामले में लापरवाही और सिस्टम की कमजोरी कितनी बड़ी कीमत चुकता सकती है। सुशांत ठाकरे अब उन सभी माता-पिता के लिए आवाज उठाना चाहते हैं जिनकी संताने ऐसी लापरवाहियों का शिकार हो जाती हैं। उनका कहना है, “मैं चाहता हूं कि ऐसी गलती किसी और के साथ न हो, और दोषियों को सजा मिले।”

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