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भारत-पाक विभाजन: दिल्ली से लाहौर तक की उस भयावह रात की दास्तान

दिल्ली से लाहौर तक की उस भयावह रात की दास्तान

विभाजन से पहले दिल्ली और लाहौर में क्या हो रहा था?

भारत का विभाजन 78 साल पहले हुआ था, लेकिन उस वक्त की घटनाएं आज भी दोनों देशों के दिलों में गहरी टीस और घाव के रूप में बनी हुई हैं। 14-15 अगस्त 1947 की रात, जब भारत ने स्वतंत्रता का जश्न मनाया, वहीं पाकिस्तान की सड़कों पर आग लग रही थी। यह वह समय था जब दोनों देशों के बीच की सीमाएं तो बंट गईं, लेकिन दर्द और हिंसा के बीज आज भी दोनों देशों के बीच बने हुए हैं।

भारत और पाकिस्तान दोनों अपनी आज़ादी की 79वीं सालगिरह मना रहे हैं, लेकिन इस दिन की तारीख को याद करते हुए आज भी उन घटनाओं का दर्द उभरता है, जब एक ही मुल्क के लोग अपनी जड़ों से कट गए थे। आइए जानते हैं उस समय दिल्ली से लाहौर तक क्या हो रहा था, जब देश बंट रहे थे और लोग अपनी पहचान और घरों को छोड़कर नई जिंदगी की तलाश में थे।


कभी एक था हमारा मुल्क: विभाजन से पहले की स्थिति

जब 1940 का दशक शुरू हुआ, तो भारत में अंग्रेजी शासन के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम अपने शिखर पर था। लोग एकजुट होकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे। लेकिन इसी दौरान ब्रिटिश “फूट डालो और राज करो” नीति ने भारतीय समाज में दरार डाल दी और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, पंडित नेहरू और महात्मा गांधी जैसे नेताओं के बावजूद एक सियासी सुलह की शुरुआत हुई। पाकिस्तान के पहले नेता मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में पाकिस्तान बनाने की योजना तैयार हुई, जिससे विभाजन की प्रक्रिया का आगाज़ हुआ।


दंगों की आंच: दिल्ली से लाहौर तक

जैसे ही ब्रिटिश कैबिनेट मिशन के तहत विभाजन की रूपरेखा तय हुई, दिल्ली और लाहौर में हलचल तेज़ हो गई। आचार्य चतुरसेन ने अपने लाहौर प्रवास के दौरान इस हालात का वर्णन किया था। उन्होंने लिखा, “महाराजा रणजीत सिंह की समाधि टूटी-फूटी थी, और बादशाही मस्जिद के गुम्बजों पर संगमरमर चढ़ाया जा रहा था, जैसे एक घर में दुल्हन के ब्याह की तैयारियां हो रही थीं, जबकि दूसरे घर में मुर्दा उठाने की तैयारी हो रही थी।”

विभाजन की आंधी में, लाहौर जैसे शहरों में खौफ और हिंसा का माहौल बन गया था। आचार्य चतुरसेन ने लाहौर के एक नाई से अपनी बाल कटवाने की घटना का जिक्र करते हुए कहा, “मुझे ऐसा लग रहा था कि नाई कहीं मेरा गला काट न दे।” यह भय और आतंक उन लोगों के लिए सामान्य हो गया था, जो विभाजन के दौर में अपनी पहचान और घर को खो चुके थे।


विभाजन की अंतिम घड़ी में असमंजस की स्थिति

विभाजन की अंतिम घड़ी तक लोग असमंजस में थे। पंजाब के गुरदासपुर जिले में लोगों को यकीन नहीं हो रहा था कि उनका जिला पाकिस्तान में जाएगा या भारत में। वहीं, लाहौर के कसूर इलाके के कई हिंदू परिवार यह सोच रहे थे कि उनका इलाका भारत में रहेगा, लेकिन 17 अगस्त को बाउंड्री कमीशन के फैसले के बाद कसूर पाकिस्तान का हिस्सा बन गया।

यह अचानक बदलाव हजारों लोगों के लिए डर और अनिश्चितता लेकर आया। इस भ्रम में कई लोग अपनी जगह छोड़ने का निर्णय नहीं ले पाए और हिंसा का शिकार हो गए। विभाजन से पहले पाकिस्तान और भारत की सीमाएं तय होने से पहले तक, बहुत से लोग अपने परिवारों को छोड़कर कहीं और नहीं जा पाए थे, जो बाद में सामूहिक हत्या और लूट का शिकार हो गए।


आजादी की रात: दिल्ली और लाहौर की अलग-अलग तस्वीरें

जब भारत ने 14-15 अगस्त 1947 की रात आज़ादी का जश्न मनाया, तो दिल्ली की सड़कों पर खुशी का माहौल था। लोग साइकिलों, कारों, तांगों, बैलगाड़ियों पर बैठकर इंडिया गेट की ओर जा रहे थे, लेकिन पाकिस्तान की सड़कों पर हिंसा का कहर था। मशहूर लेखक डोमिनिक लैपीयरे और लैरी कॉलिन्स अपनी किताब ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ में लिखते हैं, “14 अगस्त को जब सूर्य डूबा, तो भारत में यूनियन जैक को उतारकर तिरंगा लहराया गया।” दिल्ली में स्वतंत्रता का उत्सव था, लेकिन लाहौर में आग लगी हुई थी।


विभाजन के दर्द और लाहौर की यादें

आचार्य चतुरसेन ने विभाजन के बाद लाहौर में महसूस किए गए भय को एक गहरे अनुभव के रूप में साझा किया। उन्होंने कहा, “जब दिल्ली में स्वतंत्रता की रात मनाई जा रही थी, तो लाहौर जल रहा था।” वह बताते हैं कि जब ‘जन गण मन’ गाया गया तो पंजाब और सिंध के उल्लेख के साथ भीड़ के चेहरों पर विभाजन की दुखभरी यादें उभर आईं।


विभाजन के बाद का जीवन: एक नई पहचान

विभाजन के बाद, लाखों लोग शरणार्थी बन गए। उन्होंने अपने घरों, जड़ों और परिवारों को छोड़कर भारत और पाकिस्तान में एक नई जिंदगी की शुरुआत की। लेकिन उनका जीवन हमेशा के लिए प्रभावित हो गया। कई सालों तक लोग अपनी जिंदगी को समेटने और व्यवस्थित करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनके दिलों में हमेशा विभाजन की दर्दनाक यादें बनी रही।


निष्कर्ष: विभाजन की आंशिक टीस

विभाजन के समय जो हुआ, वह सिर्फ एक राजनीतिक फैसला नहीं था, बल्कि लाखों लोगों के जीवन की त्रासदी थी। दिल्ली से लाहौर तक, भारत और पाकिस्तान की धरती पर जो हलचल मची, वह आज भी दोनों देशों में महसूस होती है। विभाजन की वह रात दोनों मुल्कों के इतिहास में एक ऐसी निशानी छोड़ गई, जो समय के साथ फीकी नहीं पड़ी। दोनों देशों के लोग आज भी उस दर्द और कष्ट को महसूस करते हैं, और हर साल अपनी स्वतंत्रता की सालगिरह मनाने के बावजूद, विभाजन की टीस दोनों के दिलों में हमेशा बनी रहती है।

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