पाकिस्तान से भारत पहुंचे साहिब सिंह ने दंगाइयों से बचने के लिए अपनाया लंबा रास्ता
नई दिल्ली, 15 अगस्त 2025: भारत-पाक विभाजन की त्रासदी में लाखों लोगों ने अपना घर-परिवार छोड़कर पलायन किया। इन लाखों शरणार्थियों में से एक थे साहिब सिंह विरदी, जिन्होंने पाकिस्तान से भारत आते समय अपनी जान बचाने के लिए कई कठिन रास्ते तय किए। साहिब सिंह और उनके परिवार के लिए यह यात्रा संघर्षों और खौफनाक घटनाओं से भरी थी।
पाकिस्तान में भड़की हिंसा और दंगाइयों का हमला
साहिब सिंह का परिवार विभाजन से पहले पाकिस्तान के एक छोटे से गांव में रहता था। विभाजन के बाद, पाकिस्तान में भी हिंसा का दौर शुरू हो गया। साहिब बताते हैं, “हमारे आस-पास के सभी गांवों को दंगाइयों ने आग लगा दी थी। लोग जान बचाकर भागने के लिए मजबूर हो गए थे।”
साहिब सिंह के पिता, जो पहले डॉक्टर थे, ने अपने परिवार के साथ भारत आने का फैसला किया। उन्होंने पहले एंग्लो-इंडियन जनसंख्या वाले शहर में जाने का निर्णय लिया, ताकि वहां से वे पंजाब के डेरा बाबा नानक तक पहुंच सकें।
हथियारों का सहारा और दंगाइयों से मुकाबला
साहिब सिंह के पिता के पास विन्चेस्टर डबल-बैरल राइफल और कुछ कारतूस थे। एक दिन जब वे और उनका जत्था एक शहर पहुंचे, तो वहां पर घोड़ों पर सवार दंगाई बंदूकें और तलवारें लेकर उनकी ओर बढ़े। साहिब के पिता ने साहस दिखाते हुए दंगाइयों पर गोली चलाई, जिससे बाकी दंगाई डरकर पीछे हट गए। साहिब सिंह कहते हैं, “मेरे पिता ने अपनी जान की बाजी लगाकर हमें बचाया।”
पुलिसवाले से माफी और जम्मू-कश्मीर की ओर रुख
इसके बाद, एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर ने साहिब सिंह के पिता को लाइन में खड़ा कर गोली मारने का आदेश दिया। साहिब के पिता ने उसे डांटते हुए अपना नाम बताया, जिससे वह पुलिसवाला चौंक गया। बाद में उस पुलिसवाले को यह पता चला कि साहिब के पिता ने उसके माता-पिता का इलाज किया था, और इस पर उसने साहिब के पिता से माफी मांगते हुए उनका मार्गदर्शन किया।
पुलिसवाले ने उन्हें जम्मू-कश्मीर के रास्ते डेरा बाबा नानक जाने का सुझाव दिया। इसके बाद उनका जत्था अगली सुबह नारोवाल और संखत्रा होते हुए जम्मू-कश्मीर बॉर्डर की ओर बढ़ा।
हत्याकांड और पीछा करती भीड़
जब उनका जत्था एक गांव से निकला, तो रास्ते में हथियारों से लैस दंगाई भीड़ उनका पीछा करती रही। साहिब सिंह के पिता ने फिर से हवा में गोलियां चलाईं, जिससे भीड़ कुछ समय के लिए रुक गई। हालांकि, उनका पीछा लंबे समय तक चलता रहा। अंततः, उनका जत्था जम्मू-कश्मीर बॉर्डर तक पहुंचने में सफल रहा, लेकिन इस पूरी यात्रा में उन्होंने कई मुश्किलें और खौफनाक घटनाएं देखीं।
एक दिल दहला देने वाली यात्रा की यादें
साहिब सिंह की यात्रा सिर्फ उनके लिए नहीं, बल्कि उस समय के लाखों शरणार्थियों के लिए एक डरावनी याद है। उन्होंने न केवल अपने परिवार की सुरक्षा के लिए संघर्ष किया, बल्कि उस समय पाकिस्तान में हो रही हिंसा और विभाजन के बाद के खतरों का भी सामना किया। आज भी, जब वह अपनी यात्रा की यादों को साझा करते हैं, तो उनके चेहरे पर वही डर और संघर्ष की झलक दिखाई देती है।
निष्कर्ष
साहिब सिंह विरदी की कहानी न केवल विभाजन की त्रासदी का प्रतीक है, बल्कि यह उस समय के लाखों शरणार्थियों के साहस और संघर्ष की गवाही भी देती है। पाकिस्तान से भारत तक का उनका सफर कई परिवारों के लिए जीवन और मृत्यु का सवाल था। साहिब सिंह और उनके परिवार की यात्रा ने यह साबित कर दिया कि चाहे कितने भी खतरों का सामना करना पड़े, संघर्ष और साहस से हर मुसीबत को पार किया जा सकता है।

