राम रहीम पेरोल विवाद: 8 साल में 15 बार जेल से बाहर, 405 दिन की आज़ादी कैसे मिली?

8 साल में 15 बार जेल से बाहर, 405 दिन की आज़ादी कैसे मिली?

परिचय

रेप और हत्या जैसे गंभीर अपराधों में उम्रकैद की सजा काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम एक बार फिर पेरोल पर जेल से बाहर हैं। बीते आठ वर्षों में वे 15 बार पेरोल और फरलो पर रिहा हो चुके हैं और कुल मिलाकर 405 दिन जेल से बाहर बिता चुके हैं। यह मामला अब कानून, सरकार और न्याय व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर रहा है।


किन मामलों में मिली सजा

गुरमीत राम रहीम को दो साध्वियों से बलात्कार के मामले में 28 अगस्त 2017 को 20 साल की सजा सुनाई गई थी। इसके बाद 17 जनवरी 2019 को पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में उन्हें उम्रकैद की सजा मिली। इन दोनों मामलों के बावजूद राम रहीम को बार-बार पेरोल और फरलो मिलना चर्चा का विषय बना हुआ है।


8 साल में 15 बार पेरोल-फरलो

रिकॉर्ड के अनुसार, राम रहीम पहली बार अक्टूबर 2020 में एक दिन की पेरोल पर बाहर आए। इसके बाद 2022 से 2026 के बीच उन्हें लगातार लंबी अवधि की पेरोल और फरलो मिलती रही।
इन रिहाइयों में 21 दिन, 30 दिन, 40 दिन और यहां तक कि 50 दिन तक की पेरोल शामिल है। जनवरी 2026 में उन्हें एक बार फिर 40 दिन की पेरोल दी गई, जिसके साथ ही उनकी कुल रिहाई अवधि 405 दिन तक पहुंच गई।


हरियाणा सरकार और कानून में बदलाव

विशेषज्ञों के अनुसार, राम रहीम को बार-बार पेरोल मिलने का बड़ा कारण 2022 में हरियाणा सरकार द्वारा जेल नियमों में किया गया बदलाव है।
मई 2022 में “प्रिजनर्स गुड कंडक्ट टेंपरेरी लीव एक्ट, 2022” लागू किया गया, जिसके तहत सजायाफ्ता कैदी साल में दो बार 40-40 दिन की पेरोल ले सकते हैं।
आलोचकों का कहना है कि यह कानून जघन्य अपराधियों के लिए नहीं बनाया गया था, लेकिन राम रहीम को इस श्रेणी से बाहर मानकर इसका लाभ दिया गया।


सुरक्षा और गवाहों पर खतरे की आशंका

राम रहीम के खिलाफ अभी भी कई मामले अदालत में लंबित हैं, जिनमें गवाहों की गवाही होनी बाकी है। ऐसे में बार-बार जेल से बाहर आना गवाहों और पीड़ितों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा करता है।
पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के बेटे अंशुल छत्रपति ने इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया है और मांग की है कि पेरोल-फरलो की नीति पर सख्ती से पुनर्विचार किया जाए।


दूसरे कैदियों से तुलना

देश में हजारों उम्रकैद के कैदी हैं, लेकिन अधिकांश को इतनी बार और इतनी लंबी अवधि की पेरोल नहीं मिलती। हरियाणा में ही करीब 2,800 से अधिक उम्रकैद के कैदी हैं, जिनमें से ज्यादातर के लिए पेरोल आज भी दुर्लभ है।
तुलना करें तो फिल्म अभिनेता संजय दत्त को अपनी पूरी सजा के दौरान लगभग 160 दिन की पेरोल मिली थी, जबकि राम रहीम इससे कहीं अधिक समय जेल से बाहर बिता चुके हैं।


निष्कर्ष

राम रहीम पेरोल विवाद सिर्फ एक कैदी की रिहाई का मामला नहीं है, बल्कि यह कानून की समानता और न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता से जुड़ा बड़ा सवाल है।
जब रेप और हत्या जैसे अपराधों में सजा पाए व्यक्ति को बार-बार रियायतें मिलें, तो आम जनता का न्याय पर भरोसा कमजोर होना स्वाभाविक है। अब निगाहें अदालतों और सरकार पर हैं कि वे इस मुद्दे पर क्या ठोस कदम उठाते हैं।

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