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“राहुल का SC आदेश पर तीखा मोर्चा: आवारा कुत्तों को हटाना ‘क्रूरता’ है”

आवारा कुत्तों को हटाना 'क्रूरता' है"

सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश और राहुल गांधी का विवादित बयान

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दिल्ली-एनसीआर से सभी आवारा कुत्तों को हटाकर उन्हें नसबंदी, वैक्सीनेशन के बाद शेल्टर होम में रखने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने आठ सप्ताह के भीतर यह कार्य शुरू करने, 5,000 कुत्तों को शीघ्र कार्रवाई में पकड़ने, एनीमल हेल्पलाइन स्थापित करने और इसे सार्वजनिक सुरक्षा का मामला घोषित किया है।

भाजपा से संबंधित प्रतिरोध के बीच, कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस फैसले को “मानवता और विज्ञान विरोधी” करार देते हुए कहा:

ये बेजुबान कोई समस्या नहीं हैं जिन्हें मिटा दिया जाए। शेल्टर, नसबंदी, टीकाकरण और समुदायिक देखभाल—यही सड़कों की सुरक्षा का सही रास्ता है। तुरंत कुत्तों को हटाना क्रूर, कमदर्शी और करुणा रहित कदम है।

उन्होंने यह भी जोड़ा कि जनसुरक्षा और पशु कल्याण को साथ-साथ सुनिश्चित करना संभव है।


पशु कल्याणियों और विशेषज्ञों की तीखी प्रतिक्रिया

अनेक पशु अधिकार संगठन और विशेषज्ञ SC के आदेश को अनवैज्ञानिक, अप्रभावी और भयावह बताते हुए विरोध कर रहे हैं। PETA India ने इसे “कुत्तों की जेल” मानते हुए उल्लेख किया कि यह कदम न तो वैध है और न ही व्यावहारिक। उन्होंने नसबंदी और टीकाकरण आधारित प्रणाली को ही स्थायी और मानवीय समाधान बताया।

FIAPO और Humane World for Animals के प्रतिनिधियों ने कहा कि यह निर्णय सरकारी नीतियों (ABC Rules, 2023) का उल्लंघन है, लोगों और पशुओं दोनों के लिए खतरनाक और वैश्विक स्वास्थ्य मानकों के खिलाफ है।


सुप्रीम कोर्ट का रुख—सार्वजनिक सुरक्षा की आधारशिला

SC ने सुरक्षा संबंधी आंकड़ों—जिनमें प्रति दिन लगभग 2,000 कुत्ते काटने की घटनाएं शामिल हैं—और बच्चों व बुजुर्गों की रक्षा को प्राथमिकता देते हुए इस आदेश को पारित किया है। कोर्ट ने इस दिशा में किसी प्रकार की देरी या रोक-टोक को कठोर कानूनी कार्रवाई का अस्वीकरण कहा।


निष्कर्ष : संवेदनशीलता बनाम सुरक्षा

यह विवाद दर्शाता है कि जब सार्वजनिक सुरक्षा और पशु संबंधी मानवीय दृष्टिकोण टकराते हैं, तब संतुलन बनाना कितना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। राहुल गांधी का कहना है कि सहानुभूति और वैज्ञानिक मानकों को साथ लाकर बेहतर नीतियां बनाई जा सकती हैं। वहीं कोर्ट का तर्क है कि मौजूदा स्थिति से और ज़्यादा पीड़ा को रोकने हेतु त्वरित कदम ज़रूरी हैं।

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