BMC चुनाव ने बदली महाराष्ट्र की राजनीति
मुंबई नगर निगम (BMC) चुनाव 2026 ने महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा बदलाव ला दिया है। करीब 25 साल बाद शिवसेना का गढ़ ढह गया और पहली बार BMC में BJP का मेयर बनना लगभग तय माना जा रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की एकजुटता भी मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर सकी। नतीजों ने साफ कर दिया कि मुंबई की राजनीति अब नए दौर में प्रवेश कर चुकी है।
ठाकरे ब्रदर्स की जोड़ी भी नहीं दिला सकी जीत
बीएमसी चुनाव से पहले उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का साथ आना बड़ी राजनीतिक घटना माना जा रहा था। माना जा रहा था कि दोनों भाइयों की एकता से मराठी वोट एकजुट होगा, लेकिन चुनावी नतीजों ने इस धारणा को पूरी तरह खारिज कर दिया।
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उद्धव ठाकरे की शिवसेना को सत्ता से बाहर होना पड़ा
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राज ठाकरे की MNS दहाई का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई
मुंबई की जनता ने साफ संकेत दिया कि भावनात्मक अपील अब चुनाव जीतने के लिए काफी नहीं है।
25 साल की सत्ता और एंटी-इनकंबेंसी का असर
शिवसेना करीब ढाई दशक तक BMC पर शासन करती रही। इतने लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण एंटी-इनकंबेंसी एक बड़ा कारण बनकर सामने आई।
जनता में यह धारणा बनी कि नगर निगम में विकास की रफ्तार धीमी रही और बुनियादी समस्याएं जस की तस बनी रहीं। इसका सीधा फायदा BJP-शिंदे गठबंधन को मिला।
मराठी एजेंडा और गैर-मराठी वोटरों की दूरी
ठाकरे ब्रदर्स की राजनीति इस चुनाव में मराठी पहचान के इर्द-गिर्द सिमटी नजर आई।
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गैर-मराठी वोटर इस एजेंडे से खुद को जुड़ा हुआ महसूस नहीं कर पाए
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उत्तर भारतीयों के खिलाफ हिंसा की पुरानी घटनाओं का असर भी दिखा
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हिंदी भाषा को लेकर हुई सियासत ने भी नकारात्मक संदेश दिया
नतीजा यह रहा कि गैर-मराठी और शहरी मध्यम वर्ग का समर्थन गठबंधन से दूर चला गया।
मुस्लिम वोटर ने भी किया किनारा
इस चुनाव में मुस्लिम वोट बैंक भी ठाकरे ब्रदर्स के साथ मजबूती से खड़ा नहीं दिखा।
उद्धव ठाकरे द्वारा कांग्रेस और महा विकास अघाड़ी से दूरी बनाना मुस्लिम मतदाताओं को पसंद नहीं आया। इसका फायदा अन्य दलों को मिला और ठाकरे गुट को नुकसान उठाना पड़ा।
जमीनी संपर्क की कमी बनी बड़ी कमजोरी
चुनाव प्रचार के दौरान उद्धव और राज ठाकरे ने रैलियों की बजाय प्रेस कॉन्फ्रेंस पर ज्यादा भरोसा किया।
इससे वे आम मतदाताओं से सीधा संवाद नहीं बना पाए। दूसरी ओर, BJP और शिंदे गुट ने जमीनी स्तर पर आक्रामक प्रचार किया, जिसका असर नतीजों में साफ दिखा।
शिंदे गुट पर जनता का ज्यादा भरोसा?
एक बड़ा सवाल यह भी उठा कि क्या जनता ने ठाकरे विरासत का असली वारिस शिंदे गुट को माना।
शिवसेना के नाम और संगठन पर शिंदे गुट की पकड़ ने कई पारंपरिक शिवसैनिक वोटरों को अपनी ओर खींचा, जिससे उद्धव ठाकरे की शिवसेना कमजोर पड़ी।
ठाकरे ब्रदर्स के सामने अब ये 5 बड़े सवाल
BMC चुनाव के बाद ठाकरे भाइयों के सामने कई अहम सवाल खड़े हो गए हैं:
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क्या राज ठाकरे के साथ गठबंधन उद्धव को भारी पड़ा?
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क्या कांग्रेस से दूरी बनाना रणनीतिक भूल थी?
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क्या शिंदे गुट को ठाकरे विरासत का ज्यादा भरोसा मिला?
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क्या आगे भी राज-उद्धव साथ चुनाव लड़ेंगे?
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उद्धव ठाकरे की शिवसेना का भविष्य अब क्या होगा?
निष्कर्ष: ठाकरे राजनीति के लिए चेतावनी
BMC चुनाव के नतीजे साफ संकेत देते हैं कि सिर्फ विरासत और पहचान की राजनीति अब पर्याप्त नहीं है।
मुंबई की जनता ने विकास, प्रशासन और स्थिर नेतृत्व को प्राथमिकता दी। यह हार ठाकरे ब्रदर्स के लिए आत्ममंथन का समय है, क्योंकि अगर रणनीति नहीं बदली गई, तो आने वाले चुनाव और भी मुश्किल हो सकते हैं।
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